बनने आए थे कालिदास मातृगुप्त बन कर रह गए
महाकवि कालिदास पर आधारित रचना 'आषाढ़ का एक दिन' को बहुत ही कम शब्दों में समझाने की मेरी कोशिश मेरे शब्दों में मल्लिका- कालिदास की प्रेमिका अम्बिका- मल्लिका की माँ विलोम- मल्लिका का पति प प्रियंगु मंजरी- कालिदास की पत्नी मातृगुप्त- शासक बनने पर कालिदास का नाम
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वो लम्हें
वक़्त की तेज रफ़्तार के साथ … हमारी ज़िन्दगी की गाडी इस कदर बिना किसी आवाज के .. बिना किसी आहट के चलती है कि कब आप उम्र के आखिरी पड़ाव पर आ पहुँचते हैं पता ही नहीं चलता …और फिर आपको याद आते हैं… आपके बचपन और आपकी जवानी के वो गुजरे हुए.. खूबसूरत लम्हें | इस एहसास को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ
##chandramohankatyal, #HindiPoetry, #हिंदीकविता
ज़िंदा जीने को
मैं मानता हूँ कि ज़िंदगी में ये मायने नहीं रखता कि मैंने कितनी साँसें लीं | मायने ये रखता है कि मैंने कितनी साँसों में ज़िंदगी को जिया | इसी एहसास के साथ कुछ स्वरचित पंक्तियाँ आपसे साझा कर रहा हूँ |
अहा
किसी ने शायद यूँ ही नहीं कहा है—"बदनाम होंगे तो क्या … नाम तो होगा!" आज के दौर में यह कहावत कुछ अधिक ही सच होती दिखाई देती है। हल्के-से व्यंग्य के साथ अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियाँ आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
कुछ तो गड़बड़ है
कभी किसी दृश्य को देखते ही पहली ही नज़र में आपका मन कहता है कि … सब कुछ ठीक नहीं है … दाल में कुछ काला है … कुछ तो गड़बड़ है। इसी एहसास के साथ कुछ स्वरचित पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
आशिक़ी ऐसे ही उड़ान भरती है
A Hindi poem exploring the many shades of love—its chaos, peace, longing, silent conversations, emotional transformation, and the way it brings two souls together. It portrays love as a living force that changes hearts, reshapes lives, and gently teaches that this is how love truly learns to fly.
मयखाने के शूरवीर
बेवड़ों के हलक से… दारु नीचे खिसकी नहीं … कि ये अपने आप को रॉबिनहुड से कम नहीं समझने लगते हैं | इनके अपने ही फंडे होते हैं | ये कहते हैं कि … इस धरती पर पहले सुरा हुई … फिर सुर हुए … फिर सुर से नर और फिर मुनि | मुझे नहीं मालूम ये कितना सही है कितना गलत | लेकिन ये सुनकर मैं सोचने लगा की इसमें असुर का नाम नहीं आया | सुर से डायरेक्ट नर और मुनि बन गए | ये ससुरा असुर कहाँ गया | बस यही सोचते सोचते … सुरा से उपजे इन महानुभावों से … मैं प्रेरित हुआ …. और व्यंग्य भाव से इनकी शान में कुछ स्वरचित पंक्तियाँ पेश करने की हिमाक़त कर रहा हूँ |
आत्मसंघर्ष
A poem about questioning whether success, anger, or stubborn ambition is worth losing one's true self. It reflects an inner conflict between chasing goals at any cost and preserving one's identity, conscience, and self-respect.
##काव्यSaga #बोलतीकविताओंकासंग्रह ##my_pen_my_strength
वक़्त
वक़्त के अपने उसूल हैं … और वो इन्हीं उसूलों पर चलता है … और हकीकत ये भी है कि आप चाहें न चाहें …चलना आपको उसके साथ ही पड़ता है …लेकिन आपका …ये जो ढीठ मन है न … ये नहीं मानता …. ये वक़्त से अपनी ही बात कहता है
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