पैरों में पंख बाँध कर हौंसलों की उड़ान भरते हैं,
अभ्यर्थियों के सपने हर दिन खास और पहले से ज्यादा चमकते हैं,
शुरुआत में कुछ अतिआत्मविश्वासी होकर बेफिक्राना मिज़ाज अपनाते हैं,
तो कुछ तटस्थ होकर कछुए की चाल से बस चलते ही जाते हैं,
आता है जब इम्तिहान का दिन तो सामना होता है सच्चाई से,
बेफिक्राना मिज़ाज कहीं पीछे छूट जाता है,
और तटस्थता कभी मुक्कमल तो कभी तट पर रह जाती है,
वापस शुरु होती है उड़ान,
इस बार अनुभव, सबक और सच्चाई के साथ,
बंद कमरे और किताबों के साथ,
धीरे-धीरे अनुभव और ज्ञान तो बढता जाता है,
पर पीछे छूटते जाते हैं परिवार, कुछ दोस्त, अपना गाँव/शहर, कुछ शौक और कुछ खास,
इतना सब पीछे छूटने पर एक अधूरापन-सा आ जाता है,
और जब मुक्कमल होती है मंज़िल,
तो असल में कहलाती है
अधूरे सफ़र की पूरी कहानी .......
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