ज़िंदा जीने को

मैं मानता हूँ कि ज़िंदगी में ये मायने नहीं रखता कि मैंने कितनी साँसें लीं | मायने ये रखता है कि मैंने कितनी साँसों में ज़िंदगी को जिया | इसी एहसास के साथ कुछ स्वरचित पंक्तियाँ आपसे साझा कर रहा हूँ |

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 05 Aug, 2026 | 1 min read
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मैं मानता हूँ कि ज़िंदगी में ये मायने नहीं रखता कि मैंने कितनी साँसें लीं |

मायने ये रखता है कि मैंने कितनी साँसों में ज़िंदगी को जिया |

इसी एहसास के साथ कुछ स्वरचित पंक्तियाँ आपसे साझा कर रहा हूँ |


ज़िंदा जीने को ताउम्र इक फ़साना चाहिए

बस यूँ ही न साँसों का आना जाना चाहिए |

तू जीने की ये जिद मत छोड़ना मेरे दोस्त,

मर जाने को तो छोटा सा बहाना चाहिए ||


ज़िंदा जीने को ताउम्र इक फ़साना चाहिए 


इन अंधेरों को उजालों को तुम आने जाने दो,

मन का जुगनू बस सदैव जगमगाना चाहिए |

खुशियां ही मिलें हर पल ये जरुरी तो नहीं,

कभी आफतों से रिश्ता भी निभाना चाहिए ||

 

ज़िंदा जीने को ताउम्र इक फ़साना चाहिए

 

ये शिकवे और शिकायतें तो चलती रहेंगी,

इन बातों को न दिल से यूँ लगाना चाहिए |

बहुत ज्यादा मीठा भी अच्छा नहीं होता,

गाहे बगाहे कडुवा भी तो खाना चाहिए ||

 

ज़िंदा जीने को ताउम्र इक फ़साना चाहिए


जो बेवजह रूठें वो सारे अपने ही समझो,

तुम्हें रूठों को मनाना भी तो आना चाहिए |

कभी झुकें वो तो कभी तुम भी तो झुको,

यूँ ही ज़िंदगी का लुत्फ़ लेते जाना चाहिए | 

ज़िंदा जीने को ताउम्र इक फ़साना चाहिए

 

हम तो जीते हैं फ़क़त मोहब्बत की खातिर,

यूँ ही सोचते हैं कभी तुम्हें बताना चाहिए |

प्यार करो या न करो ये तुम्हारी फितरत है,

झूठ मूठ का ही सही पर दिखाना चाहिए ||

 

ज़िंदा जीने को ताउम्र इक फ़साना चाहिए

 

✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवी • लेखक

ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत

ईमेल : katyalchandra@gmail.com

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