दो पैरों वाला प्राणी

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 21 Jul, 2026 | 1 min read

एक प्राणी है जिसे हम इंसान कहते हैं..... इसकी कारगुजारियों पर ….

कुछ स्वरचित पंक्तियाँ साझा कर रहा हूँ | 

दो पैरों वाला ये प्राणी ,

है जन्मों जन्मों का शातिर |

इसने रब का खेल बनाया,

छल के मंसूबों की खातिर ||

 

रब जो यत्र तत्र मिलता था,

भोले चेहरों पर खिलता था |

मीठी वाणी सुथरे मन में,

अविरल गंगा सा बहता था ||

 

उसको मंदिर में खिसकाके ,

जाने इसने कहाँ छुपाया |

वहां बिठा के रब की प्रतिमा ,

मंदिर में ताला जड़वाय ||

 

ऐसी व्याख्या कर दी रब की,

सबकी बुद्धि हो गई फेल |

रब को कैसे पाएं इस पर ,

खूब मचा दी रेलमपेल ||

 

इतने रख दिए रब के नाम,

गुम हो गई उसकी पहचान |

रब के नाम की लूट मचा के,

कर दिया उसका काम तमाम ||

 

ठेकेदारों से जब पूछा,

क्या है रब का पता ठिकाना |

कहाँ पे रहता कहाँ पे बसता,

कहाँ है उसका आना जाना ||

 

कोई बोला ढूंढो वन में,

या पर्वत पे या उपवन में |

तभी कोई धीरे से बोला ,

वो तो बसता तेरे मन में ||

 

मैं बोला जो रहता मन में,

वो तो वैसे ही मेरा है |

क्योंकि रहने को मैनें ही ,

उसको दिया बसेरा है ||

 

में पूछूँ की कौन हैं ये जो,

चोगे पीले श्वेत पहनकर |

बैठ गए हैं मुखिया बनके,

गली मोहल्ले शहर शहर ||

 

यहीं कहीं पर तेरे मन में,

सत स्थापित है भगवान् |

वहीँ किसी कोने में बैठा ,

पतित तमोगुण इक शैतान ||

 

सो तुम इधर उधर न दौड़ो,

खुद को मन मंदिर से जोड़ो |

मन में झांको शीश नवाओ,

भगवत सत्ता से जुड़ जाओ || 

भगवत सत्ता से जुड़ जाओ || 

चंद्र मोहन कत्याल

एल्डेको ग्रीन मीडोज, ग्रेटर नॉएडा,

उत्तर प्रदेश-201310, भारत

ईमेल : katyalchandra@gmail.com 

 

नोट: यह स्वरचित रचना किसी पर दोषारोपण करने के लिए नहीं,

अपितु इतना सन्देश देने के लिए है कि ………..

ईश्वर आपके मन में है अतः पवित्र मन से इसका आनंद लें |





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