एक प्राणी है जिसे हम इंसान कहते हैं..... इसकी कारगुजारियों पर ….
कुछ स्वरचित पंक्तियाँ साझा कर रहा हूँ |
दो पैरों वाला ये प्राणी ,
है जन्मों जन्मों का शातिर |
इसने रब का खेल बनाया,
छल के मंसूबों की खातिर ||
रब जो यत्र तत्र मिलता था,
भोले चेहरों पर खिलता था |
मीठी वाणी सुथरे मन में,
अविरल गंगा सा बहता था ||
उसको मंदिर में खिसकाके ,
जाने इसने कहाँ छुपाया |
वहां बिठा के रब की प्रतिमा ,
मंदिर में ताला जड़वाय ||
ऐसी व्याख्या कर दी रब की,
सबकी बुद्धि हो गई फेल |
रब को कैसे पाएं इस पर ,
खूब मचा दी रेलमपेल ||
इतने रख दिए रब के नाम,
गुम हो गई उसकी पहचान |
रब के नाम की लूट मचा के,
कर दिया उसका काम तमाम ||
ठेकेदारों से जब पूछा,
क्या है रब का पता ठिकाना |
कहाँ पे रहता कहाँ पे बसता,
कहाँ है उसका आना जाना ||
कोई बोला ढूंढो वन में,
या पर्वत पे या उपवन में |
तभी कोई धीरे से बोला ,
वो तो बसता तेरे मन में ||
मैं बोला जो रहता मन में,
वो तो वैसे ही मेरा है |
क्योंकि रहने को मैनें ही ,
उसको दिया बसेरा है ||
में पूछूँ की कौन हैं ये जो,
चोगे पीले श्वेत पहनकर |
बैठ गए हैं मुखिया बनके,
गली मोहल्ले शहर शहर ||
यहीं कहीं पर तेरे मन में,
सत स्थापित है भगवान् |
वहीँ किसी कोने में बैठा ,
पतित तमोगुण इक शैतान ||
सो तुम इधर उधर न दौड़ो,
खुद को मन मंदिर से जोड़ो |
मन में झांको शीश नवाओ,
भगवत सत्ता से जुड़ जाओ ||
भगवत सत्ता से जुड़ जाओ ||
चंद्र मोहन कत्याल
एल्डेको ग्रीन मीडोज, ग्रेटर नॉएडा,
उत्तर प्रदेश-201310, भारत
ईमेल : katyalchandra@gmail.com
नोट: यह स्वरचित रचना किसी पर दोषारोपण करने के लिए नहीं,
अपितु इतना सन्देश देने के लिए है कि ………..
ईश्वर आपके मन में है अतः पवित्र मन से इसका आनंद लें |
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