कभी किसी दृश्य को देखते ही पहली ही नज़र में आपका मन कहता है कि …
सब कुछ ठीक नहीं है … दाल में कुछ काला है … कुछ तो गड़बड़ है।
इसी एहसास के साथ कुछ स्वरचित पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
***
छप्पन व्यंजन से सजी हुई,
चांदी की सुन्दर थाली हो |
पर खाने वाला एक न हो,
घर की ऐसी बदहाली हो ||
तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह
घर का कुनबा हो भरा पुरा,
पर स्नेह की झोली खाली हो |
परिजन समूह बिखरा बिखरा,
न होली न दिवाली हो ||
तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह
जब बागों में हो सन्नाटा,
गायब सारी हरियाली हो |
हर कोना हो सूना सूना,
न फूल हो न कोई माली हो ||
तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह
हो नेताओं का जमावड़ा,
कोई भीड़ न सुनने वाली हो |
कुछ मातम जैसा पसरा हो,
न भाषण हो न ताली हो ||
तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह
महफ़िल में यारों की फैले,
बोतल और प्याले खाली हों |
पी के दारु खा के मुर्गा,
सब टल्ली बने बवाली हों ||
तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह
जब मौसम हो भीना भीना,
और हवा बड़ी मतवाली हो |
फिर घरवाली हो दूर कहीं,
और बगल में बैठी साली हो ||
तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ है
✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवी • लेखक
ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत
ईमेल : katyalchandra@gmail.com
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