कुछ तो गड़बड़ है

कभी किसी दृश्य को देखते ही पहली ही नज़र में आपका मन कहता है कि … सब कुछ ठीक नहीं है … दाल में कुछ काला है … कुछ तो गड़बड़ है। इसी एहसास के साथ कुछ स्वरचित पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 04 Aug, 2026 | 1 min read
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कभी किसी दृश्य को देखते ही पहली ही नज़र में आपका मन कहता है कि …

सब कुछ ठीक नहीं है … दाल में कुछ काला है … कुछ तो गड़बड़ है। 

इसी एहसास के साथ कुछ स्वरचित पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

*** 

छप्पन व्यंजन से सजी हुई,

चांदी की सुन्दर थाली हो |

पर खाने वाला एक न हो,

घर की ऐसी बदहाली हो || 

तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह 


घर का कुनबा हो भरा पुरा,

पर स्नेह की झोली खाली हो |

परिजन समूह बिखरा बिखरा,

न होली न दिवाली हो || 

तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह 


जब बागों में हो सन्नाटा,

गायब सारी हरियाली हो |

हर कोना हो सूना सूना,

न फूल हो न कोई माली हो || 

तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह  


हो नेताओं का जमावड़ा,

कोई भीड़ न सुनने वाली हो |

कुछ मातम जैसा पसरा हो,

न भाषण हो न ताली हो || 

तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह 


महफ़िल में यारों की फैले,

बोतल और प्याले खाली हों |

पी के दारु खा के मुर्गा,

सब टल्ली बने बवाली हों || 

तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ ह 


जब मौसम हो भीना भीना,

और हवा बड़ी मतवाली हो |

फिर घरवाली हो दूर कहीं,

और बगल में बैठी साली हो || 

तो समझ लो कुछ तो गड़बड़ है


✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवी • लेखक

ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत

ईमेल : katyalchandra@gmail.com

#ChandraMohanKatyal, #HindiPoetry, #हिंदीकविता


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