वक़्त

वक़्त के अपने उसूल हैं … और वो इन्हीं उसूलों पर चलता है … और हकीकत ये भी है कि आप चाहें न चाहें …चलना आपको उसके साथ ही पड़ता है …लेकिन आपका …ये जो ढीठ मन है न … ये नहीं मानता …. ये वक़्त से अपनी ही बात कहता है

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 11 Jul, 2026 | 1 min read

अक्सर जब कोई व्यक्ति सेवानिवृत होता है तो वो अपनी बाकी की ज़िंदगी को गुजारने के जाने कैसे कैसे सपने देखता है | अपने मन की इच्छाओं आकांछाओं को व्यक्त करते हुए वो वक़्त से क्या कहता है .. कुछ स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ |

रुक जा थम जा वक़्त जरा सा धीरे चल तू ,

धीरज रख मत शोर मचा मत कर हलचल तू |

तू कुछ ठहरे तो थोड़ा सा में भी जी लूँ ,

बची खुची जीवन अमृत की बूंदें पी लूँ ||

 

अभी तलक तो दौड़ दौड़ के जान खपाई,

आपाधापी की भगदड़ में उम्र गँवाई |

भागमभाग का तूफां अभी अभी ठहरा है ,

जीवन की ठंडी संध्या बस अभी है आई ||

 

बस अब मस्ती के झोंके अंदर आने दो,

जीवन की मीठी धुन मुझको सुन पाने दो |

खो न जाए चैन कहीं ये पल दो पल का,

छेड़ो न मुझको गुम इसमें हो जाने दो ||

 

फुर्सत से अब अपनों को में पास बिठा लूँ,

रिश्तों की गर्मी का कुछ अहसास दिला लूँ |

ग़मों की अदला बदली कर रिश्ते सुलझा लूँ ,

थोड़ा मानूं में थोड़ा सा उन्हें मना लूँ ||

 

रुक पिछली भूलों का में इकरार तो कर लूँ ,

अपनें जज्बातों का कुछ इज़हार तो कर लूँ |

रेत की माफिक मुट्ठी से क्यूँ रहा फिसल तू ,

रुक जा थम जा वक़्त जरा सा धीरे चल तू || 

चंद्र मोहन कत्याल

एल्डेको ग्रीन मीडोज,

ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत

ईमेल : katyalchandra@gmail.com






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