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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

उद्धव-कृष्ण संवाद :2

अपने भाई के आदेश पर जब दुःशासन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही! तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा! उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुःशासन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया! जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर- 'हरि, हरि, अभयम् कृष्णा, अभयम्'- की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला। जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया। अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ ?" उद्धव बोले- "कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई! क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ ?" कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा- "इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा ? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे ?" कृष्ण मुस्कुराए- "उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है। न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ। मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ। मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ। यही ईश्वर का धर्म है।" "वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण! तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?" हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे ? आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें ? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें ?" उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा! तब कृष्ण बोले- "उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।" जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे ? तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे। जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! ।। कृष्णम् वन्दे जगतगुरूम् ।? || जय श्री कृष्णा||

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 0 mins read

गीत

वो ब्रज बिहारी कृष्ण मुरारी मन मेरे म्ह बसग्या। उस गिरधारी की भक्ति के म्हा मन मेरा फंसग्या।। कण कण म्ह वास उसका के तेरे म्ह के मेरे म्ह। एक उसका नाम साचा इस दुनिया के डेरे म्ह। वो हे उभारै भक्तां नै जो फंसे होनी के फेरे म्ह। मन के अँधेरे म्ह उसकी भक्ति का दिवा चसग्या।। गोकुल के म्हा पला वो वासुदेव देवकी कै जण कै। माखन चुराया गोपी सताई यशोदा का लाल बण कै। गऊ चराई बंसी बजाई रहा वो कृष्ण सदा तण कै। कालिये के फण कै ऊपर नाच्या जो लाखां नै डसग्या।। कंश, पुतना, शिशुपाल मार धरती का बोझ घटाया। कुरुक्षेत्र के म्हा उस कृष्ण गीता का ज्ञान सुनाया। बन सारथी रण कै म्हा उस अर्जुन का मान बढ़ाया। नरसी का भात भराया ओड़े रपियाँ का मींह बरसग्या।। दादा जगन्नाथ बी उस मुरली मनोहर नै रटै जावैं सं। गुरु रणबीर सिंह बी आठों पहर उसके गुण गावैं सं। सुलक्षणा भक्ति कै बस म्ह हो कृष्ण दौड़े आवैं सं। वो मोक्ष पावैं सं जिनका मन भक्ति म्ह धँसग्या।।

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

कृष्ण

ऋषियों ने यह कहा कि अन्यान्य अवतार उस भगवान के अंश और फलस्वरूप हैं लेकिन श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान हैं। (श्रीमद्भागवत महापुराण) वे एक ही स्वरूप में अभूतपूर्व संन्यासी और अद्भुत गृहस्थ हैं, उनमे अत्यधिक अद्भुत रजोगुण व शक्ति थी, साथ ही वे त्याग की पराकाष्ठा थे। गीता के प्रचारक श्रीभगवान अपने उपदेशों की साकार मूर्ति थे, वेदों की ऋचाएं उनका ही गायन करती हैं, अनासक्ति के उज्ज्वल उदाहरण हैं श्रीभगवान।उन्होंने कभी सिंहासन नही अपनाया, न ही उसकी चिंता की। जिनके आने से राजा और चक्रवर्ती सम्राट अपने मुकुट उनके चरणों मे रख देते थे, जिनको प्रथम पूज्य बनाकर युधिष्ठिर जैसे राजा अपने को धन्य समझते थे, उन श्रीभगवान ने सदैव राजा उग्रसेन के प्रतिनिधि के रूप में एक छोटी से नगरी में अनासक्त कर्म किया। उन्होंने बाल्यकाल में जिस सरल भाव से महान परमहंस गोपियों के साथ क्रीड़ा की, वही सरलता कंस के वध, महाभारत के युद्ध और यदुवंश के विनाश तक बनी रही। इतनी सरलता और मधुरता कि दो सेनाओं के बीच वह मुस्कराते हुए अर्जुन को विश्व का महानतम गूढ़तम दार्शनिक ज्ञान देते हैं जो आज भी पढ़ा जा रहा है लेकिन लोग तृप्त नहीं हो पा रहे। जो किया पूरे मन से, गोपियों के साथ सर्वश्रेष्ठ प्रेमी, नन्द बाबा और यशोदा माँ के सर्वश्रेष्ठ पुत्र ऐसे कि सब उनके जैसा पुत्र चाहते हैं, रुक्मिणी के पति के रूप में आदर्श पति, आदर्श योद्धा, आदर्श दार्शनिक, आदर्श रणनीतिकार, आदर्श राजनेता, और न जाने क्या क्या। विश्व के इतिहास में इतनी अनासक्ति और पूर्णता के साथ जीवन किसी ने आज तक नहीं जिया। साकार निराकार, कर्म सन्यास, यज्ञ दान तप और न जाने ऐसे कितने विवादों को अपनी सहज और प्रामाणिक तर्कसंगत वाणी से समाप्त कर दिए और बोले कि आत्मशुद्धि की तरफ बढ़ो। कर्म का एकमात्र उद्देश्य आत्मशुद्धि है।गोपियों के साथ उनके विशुध्द प्रेम को केवल एक आजन्म पवित्र नित्य शुद्ध शुकदेव गोस्वामी जैसा पूर्ण ब्रह्मचारी और पवित्र स्वभाव वाला प्रेमरूपी मदिरा में डूबा भक्त ही समझ सकता है। जिसने प्रेम में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया हो केवल वह ही मेरे श्रीभगवान मधुराधिपते को समझ सकता है। अहैतुकी भक्ति, निष्काम प्रेम, निरपेक्ष कर्तव्य निष्ठा का आदर्श धर्म के इतिहास में एक नया अध्याय है जो प्रथम बार सर्वश्रेष्ठ अवतार श्रीभगवान कृष्ण के मुख से निकला, जिनके कारण धर्म से भय और प्रलोभन हमेशा के लिए समाप्त हो गए। प्रेम केवल प्रेम के लिए, कर्तव्य कर्तव्य के लिए, काम काम के लिए। यह श्रीभगवान के मौलिक आविष्कार हैं जिन्हें उनसे पहले वेदों ने भी नहीं गाया। जिसके हृदय में अभी भी धन, स्त्री या पुरुष और यश के बुलबुले उठते रहते हैं, वह तो गोपियों और श्रीभगवान के प्रेम को समझने का साहस भी न करे। वह प्रेम तो ऐसा है कि उस समय संसार का कोई स्मरण नही रहता, समस्त प्राणियों में केवल श्रीभगवान दिखते हैं, आत्मा केवल श्रीकृष्ण से भर जाती है।

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 0 mins read

जन्माष्टमी

वेदों और उपनिषदों की व्याख्या करना बड़ा मुश्किल है, और संसारी जीवों को तो उसका अर्थ भी नहीं उतरता। इसलिए वेद जिनकी सांसें हैं, उन्ही श्रीभगवान ने आविर्भूत होकर गीता कर प्रचारक के रूप में श्रुति का अर्थ समझाया, और आश्चर्य यह कि इसे उपनिषदों और वेदों का निचोड़ माना गया। यहां आदि शंकराचार्य को अद्वैत मर दिखता है तो श्रीरामानुजाचार्य को विशिष्ट अद्वैत तो श्रीमध्व आचार्य को द्वैत दिखता है। सभी मत और सम्प्रदाय यहां आकर अपनी पूर्णता को प्राप्त हो जाते हैं। श्रीभगवान जब कहते हैं कि तुम हर मार्ग से मेरी ही आराधना करते हो, तो मन से सभी संशय और भय समाप्त हो जाते हैं। श्रीभगवान कहते हैं कि यह सारा जगत मुझमे वैसे ही गूंथा है जैसे धागे में मणि रहती है, क्योंकि मुझसे अलग तो कुछ है ही नहीं, तो सारी संकीर्णता और भेदभाव की दीवार गिर जाती है। गीता के वाक्य, श्रीकृष्ण की वज्र के समान गंभीर और महती वानीसब के बंधन तोड़ देती है और सभी को परम् पद का अधिकारी बना देती है। पलायन तो उनके शब्दकोश में नहीं था। कर्मयोगियों में सर्वश्रेष्ठ भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने उपदेशों को जिया, और कहा कि कर्म किए बिना कोई नहीं रह सकता, कर्म करो लेकिन उसका विज्ञान समझो, कर्म जम के करो लेकिन फल की चिंता न करो, उलझ मत जाओ, कर्म का एकमात्र उद्देश्य है आत्मशुद्धि, इसलिए चिंता न करो, श्रीभगवान की शरण मे आ जाओ और वह तुम्हे सभी पापों से मुक्त कर देंगे। जिन्हें राजसूय यज्ञ में मेहमानों के जूते साफ करने में भी आनंद आता है, और अपने भक्त का रथ हांकने में भी, जिन्हें मिट्टी खाने में मजा आता गई और गरीब सुदामा के सूखे चावल भी, ऐसे महानतम श्रेष्ठतम प्रियतम अद्भुत आश्चर्य और विरोधाभास से भरे हुए साकार और निराकार से परे श्रीकृष्ण ही मेरी गति हों, मेरे आश्रय हो, और मैं अनन्तकाल तक उनका दास रहूं। जहां जहां जाऊं करूं तेरी सेवा तुम सम ठाकुर और न देवा।।

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

ग़ज़ल

जाते जाते वो अपनी तस्वीर दे गए, हँसती हुई मेरी आँखों में नीर दे गए। देखती रही अपने हाथों को चुपचाप, हाथों में वो जुदाई की लकीर दे गए। मन में एक कसक रहेगी ता-उम्र अब, जिंदगी भर कम ना हो ऐसी पीर दे गए। मोहब्बत का मेरी मजाक बना गये वो, बेवफाई का इल्जाम वो मेरे सिर दे गए। दोष किसको दूँ उनको या हालात को, जाते हुए मुझे ख़िताब ऐ फकीर दे गए। मेरी मोहब्बत ही इतनी गरीब निकली, कौड़ियों के भाव गैरों को ज़मीर दे गए। आगाह कर सके "सुलक्षणा" औरों को, इसीलिये वो कलम ऐ शमशीर दे गए। ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 0 mins read

ग़ज़ल

बैठा है अपने दिल में छुपाकर राज कोई। बंद लबों से दे रहा है मुझे आवाज कोई। अपनी आँखों से हाल ऐ दिल बयाँ करके, निभा रहा है मोहब्बत का रिवाज कोई। दिल गुनगुना बैठा तराना ऐ मोहब्बत, दे गया चुपके से मोहब्बत का साज कोई। दिल धड़काया नज़रों से नजरें मिला कर, ऐसे कर गया मोहब्बत का आगाज कोई। अजीब सी हालत हो गयी मोहब्बत में, ना जाने कैसे होगा इसका इलाज कोई। दिन रात ख्यालों में खोई रहती हूँ मैं, खुद से भी प्यारा लगने लगा आज कोई। जिस दिल पर लाखों पहरे बिठा रखे थे, आज उस दिल का बन गया सरताज कोई। बस एक ही दुआ है मुझे मिल जाए वो, नहीं चाहिएँ मुझे तख़्त ओ ताज कोई। उसकी मोहब्बत के साये में बीते जिंदगी, सच कहने में रखती नहीं हूँ लिहाज कोई।

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Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

ठाकुर जी

ठाकुर जी

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

भगवान् श्री कृष्ण

जुगलकिशोर ठाकुर जी महाराज

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Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

सीख

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

वीर सावरकर

कांग्रेस की छात्र विंग एनएसयूआई के कार्यकर्ता दिल्ली विश्वविद्यालय में जाकर वीर सावरकर की प्रतिमा पर कालिख पोत रहे हैं लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा। वह सावरकर, जिन्हें दोहरे आजीवन कारावास की सजा हुई, पर कांग्रेस उन्हें वीर नहीं मानती। उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से षड्यंत्र कर उनके विचारों को सांप्रदायिक बताया जाता है हमें सावरकर के कार्यों और उनके आदर्शों को छत्रपति शिवाजी और चाणक्य की कार्यविधियों से तोलना होगा, न कि गांधी जी के साथ। सावरकर के खिलाफ वामपंथियों और इस्लामी ताकतों ने दुष्प्रचार किया है और अभी भी कर रहे हैं। अपने 37 वर्ष के लंबे कार्यकाल में, जिस दौरान उन्होंने भारत की नियति को बदला और हिंदवी स्वराज की नींव रखी, छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब को चार माफीनामे भेजे थे। इनमें से तीन माफीनामे उनके और मुगलों के बीच लिखित संधियों के बाद के थे। लेकिन इन सभी संधियों को स्वयं शिवाजी ने तोड़ा था, क्योंकि यह उनकी स्वतंत्र हिंदू राज्य स्थापित करने और सबको समान अधिकार देने की दीर्घकालिक नीति का हिस्सा था। विनायक दामोदर सावरकर शिवाजी के अनुयायी थे। वे गांधी जी के विशुद्ध अहिंसा के सिद्धांत में विश्वास नहीं रखते थे। जैसे शिवाजी 1666 में आगरा से मिठाइयों के टोकरे में छुपकर मुगल कैद से फरार हुए थे, उसी से प्रेरणा लेकर सावरकर ने भी 1910 में मोरिया नामक एक स्टीमर से पलायन किया था, जिस पर उन्हें लंदन में ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने और मदन लाल ढींगरा द्वारा ब्रिटिश अफसर की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में ले जाया जा रहा था। उन्हें 60 वर्ष की कड़ी सजा मिली थी। जैसे ही स्टीमर मार्से के फ्रांसीसी तट के निकट पहुंचा, सावरकर ने उस पर मौजूद एक छिद्र में से निकल कर समुद्र में छलांग लगा दी और तैर कर किनारे पहुंचे। वहां मौजूद फ्रांसीसी अधिकारियों ने सोचा कि वे ब्रिटिश बंधक हैं, इसलिए उन्हें पकड़ कर स्टीमर के किनारे पहुंचते ही ब्रिटिश अधिकारियों के हवाले कर दिया। इसलिए जब हम सावरकर की माफी का आकलन करते हैं, तब हमें सही नतीजे पर पहुंचने के लिए शिवाजी की युक्तियों के बारे में सोचना पड़ता है, न कि गांधीवादी नीतियों पर। और ऐसा करने पर हमें पता चलता है कि उनका माफीनामा खुद को जेल से बाहर रखने की नीति से जुड़ा था, ताकि वे अपनी राष्ट्रीय-दृष्टि को आगे ले जा सकें। इस जोरदार और तार्किक दलील की बुनियाद अपने आप में बहुत पुख्ता है। 1913 में एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी रेगिनल्ड क्रेडक सेल्युलर जेल में कैदियों द्वारा विरोध प्रदर्शन के बाद वहां की हालत देखने आए और जाते हुए जेल कर्मचारी को गोपनीय हिदायत देकर गए। उन्होंने कहा अन्य कुछ कैदियों की तरह सावरकर को जेल से बाहर समुद्र किनारे टहलने की इजाजत न दी जाए, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो पहला मौका मिलते ही सावरकर वहां से फरार हो जाएंगे। क्रेडक ने कहा कि संभव है सावरकर को वहां से निकालने के लिए उनके कुछ साथी समुद्री जहाज भी लेकर आ सकते हैं। यह प्रकरण बताता है कि अंग्रेज सरकार क्रांतिकारी सावरकर से कितनी खौफजदा थी। वामपंथियों और छद्मवादियों ने सावरकर को बदनाम करने की एक और चाल चली। उन्होंने भगत सिंह को वामपंथी विचारधारा वाले व्यक्ति के तौर पर सामने रखा और कहा कि कैसे वे खुशी-खुशी फांसी चढ़ गए थे। इसके विपरीत, कैसे सावरकर ने अपनी रिहाई के लिए अंग्रेजों से माफी मांगी थी। सच यह है कि भगत सिंह का समूचा परिवार स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज आंदोलन से प्रभावित रहा था। भगत सिंह ने लाहौर में दयानंद सरस्वती विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी। एक प्रदर्शन के दौरान जब ब्रिटिश लाठियों के हमलों से लाला लाजपत राय की मौत हुई, तब भगत सिंह ने अंग्रेजों से बदला लेने की सौगंध ली थी। लाला लाजपत राय भी आर्य समाज के अनुयायी थे। वहीं, भगत सिंह के कई साथी भी आर्य समाज से जुड़े हुए थे। अगर वामपंथी यह दावा करते हैं कि भगत सिंह ने एक कम्युनिस्ट पुस्तक का गुरमुखी में अनुवाद किया था, तो इस बात के भी प्रमाण हैं कि उन्होंने सावरकर के ग्रंथ "माई ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ" का भी अनुवाद किया था। इस पुस्तक में सावरकर के कठोर कारागार के दिनों की दास्तान है। भगत सिंह द्वारा लिखी पुस्तक "मैं नास्तिक क्यों हूं" एक वामपंथी इतिहासकार द्वारा लिखी गई है, जिसमें विचारधारा को आधार बनाते हुए तथ्यों से खिलवाड़ किया गया है। इसलिए कई लोगों का मानना है कि यह वामपंथी चाल है, क्योंकि पुस्तक भगत सिंह के फांसी चढ़ने के फौरन नहीं, कुछ वर्षों के बाद आई थी।

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

वीर सावरकर:2

सावरकर के जीवनी लेखक धनंजय कीर ने "वीर सावरकर" में लिखा है कि अपने क्रांतिकारी कार्य को अंजाम देने से पहले भगत सिंह सावरकर से मिलने के लिए रत्नागिरि गए थे और संभवत: वह सावरकर के विचारों से प्रेरित भी थे। समय के साथ-साथ मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले राजनीतिक दल और अन्य विघटनकारी ताकतें देश की ऊर्जा को समाप्त करने को आमादा हो गए, उसे देखते हुए भारतवर्ष के अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी तरह के तुष्टिकरण से इनकार करने वाले सावरकर के विशुद्ध राष्ट्रवाद का महत्व और बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए कि यदि हम भारत के पिछले 120 वर्ष के इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि राजनीतिक अखाड़े में मुस्लिम रणनीतिकारों ने अलग-अलग बहाने से लगभग सभी हिंदू नेताओं से जब-तब बेहिसाब और गैरवाजिब छूट प्राप्त की है। नेताओं की इस सूची से बाहर केवल वीर दामोदर सावरकर ही नजर आते हैं जो मुस्लिम नेताओं की बातों में नहीं आए। यह तमाम छूट हिंदू हितों की तिलांजलि देकर और मुस्लिमों के बीच बंटवारे के बीज बोकर प्राप्त की गई। और जो नेता इस चतुर मुस्लिम नीति का शिकार हुए उन्होंने न्याय और निष्पक्षता को ताक पर रख कर मुस्लिम समुदाय के लिए तमाम चुनावी रियायतें उपलब्ध कराईं। इन नेताओं में कट्टर राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य तिलक भी शामिल थे। 1916 के लखनऊ समझौते के आधार पर तिलक द्वारा मुस्लिमों के लिए प्राप्त की गई छूट, मुस्लिमों के चुने गए नुमाइंदों की संख्या के अनुपात में कहीं ज्यादा थी। ऐसा लगता है कि मुस्लिम नेतृत्व तिलक जैसे मजबूत नेताओं से भी जैसे चाहे अपनी बात मनवा सकता था। बेशक गांधीजी ने तिलक की अपेक्षा मुस्लिम तुष्टीकरण को कहीं ज्यादा प्रश्रय दिया था। इसके पीछे की भ्रामक धारणा यह थी कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना भारत की स्वतंत्रता या तो संभव नहीं या अर्थहीन है। यही कारण है कि उग्र इस्लामिक और वहाबी तंजीमों ने हमेशा सावरकर और उनकी विचारधारा को नीचा दिखाने की कोशिश की है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि आज हिंदुओं द्वारा अभ्यास में लाया जाने वाला राष्ट्रवाद सोडा बोतल जैसा है। किसी आतंकी हमले या टेलीविजन पर हमारे सैनिकों के शवों को दिखाए जाने पर यह उफान मारता है और ऐसी हरेक घटना के कुछ देर बाद शांत हो जाता है। इसके विपरीत, यदि सावरकर के विशुद्ध राष्ट्रवाद को हिंदुओं में फैला दिया जाए तो बहुसंख्यक समुदाय को विभाजित करने वाली या अपने उद्देश्यों की खातिर राष्ट्रवाद को कमजोर करने वाली ताकतों के पैरोकारों का काम करना लगभग असंभव हो जाएगा। इसीलिए जब भी सावरकर का नाम सामने आता है, ये कूटनीतिकार एकजुट होकर उनकी छवि दागदार करने के लिए पूरे जोर से हमला बोल देते हैं।किसी भी सशक्त विचार में महान शक्ति समाहित होती है। गौतम बुद्ध के निर्वाण के 250 वर्ष बाद कोई भी उनके या उनकी विचारधारा के बारे में नहीं जानता था। ऐसे में सम्राट अशोक ने बौद्ध मत अपनाया और उसे मत प्रचारकों के जरिए भारत की सीमाओं के बाहर फैलाया। और आज बौद्ध मत, जो सावरकर के अनुसार कभी हिंदू धर्म का ही हिस्सा था, विश्व का तीसरा सबसे बड़ा मत बन चुका है।इसी तरह, सावरकर का विशुद्ध राष्ट्रवाद भी कई दशकों से हाशिए पर पड़ा रहा है। लेकिन अब उसके सामने आने का समय आ चुका है, क्योंकि देश विरोधी ताकतें कई रूपों में अपने सिर उठा रही हैं।

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Raghav Sen
Raghav Sen 24 Aug, 2019 | 2 mins read

My adventure

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