कितनी परतें हैं इस अनजाने मन की

हमारे मन में कभी-कभी इतना सब चलता रहता है कि हमारा अंतर्मन विचलित होने लगता है ।

Aarti Kushwah
15 Sep, 2026 • 1 min read • hi
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कितनी परतें हैं इस अनजाने मन की

न जाने कितनी परतें हैं इस अनजाने मन की,

परत-दर-परत जब खोलते हैं

तो हर परत पर एक अलग मंज़र पाते हैं,

कहीं छुपी होती हैं बचपन की वो भोली यादें,

तो कहीं दफ़न होती हैं अनकही-सी बातें,

कहीं दर्द का एक समंदर खामोश बैठा मिलता है,

तो कहीं उम्मीद का फूल चुपके से खिलता है,

हर परत के पीछे एक नई दुनिया बसी है,

जहाँ ख्वाइशों की नदी चुपचाप बहती है,

समझते हैं जिसे हम अपना ही चेहरा,

वहीं अंदर कोई अनजान-सा राज़ रहता है गहरा,

टोह लो कितना भी गहरा, अंत मिलता ही नही,

ये मन भी एक समंदर है जो कभी थकता नही,

खुद को ही पढ़ते-पढ़ते उमर बीत जाती है,

हर परत एक नए सफ़र की कहानी कह जाती है ........








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