षष्ठम कात्यायनी
नवरात्रि का छठा दिन, मां कात्यायनी का ध्यान
माया का भ्रम जब इतना बढ़ जाए कि अपने भीतर ही तरह-तरह के राक्षस जन्म लेने लगें, तब जरूरी हो जाता है कि आध्यात्मिक ऊर्जा जागृत हो, जो अपनी ही इंद्रियों से जन्म लेने वाले दैत्य भावों का संहार कर सके।
कहते हैं, इस लोक में रहकर ही परलोक सुधार सकते हैं। इसके लिए अन्य कोई व्यवस्था कहीं नहीं है, इसलिए अपने भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का आह्वान करके प्रत्येक पल को सजगता से जीना ही सहजता है, जो माया के इस युग में प्राप्य नहीं है। माया के इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए आंतरिक ऊर्जा का आह्वान करना जरूरी है। तो बढ़िए आगे, ध्यान साधना की ओर और अपनी चेतना का विकास कीजिए। देर किस बात की है!
षष्ठम् कात्यायनी...
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
ध्यान विधि 🪷
शांत होकर सीधे बैठ जाएँ और आँखें बंद कर लें। अपना ध्यान दोनों भौहों के मध्य स्थित आज्ञा चक्र पर केंद्रित करें। गहरी साँस लें और छोड़ते हुए मन को शांत होने दें। अब मन ही मन माँ कात्यायनी का स्मरण करें और उनकी दिव्य ऊर्जा को अपने भीतर अनुभव करने का भाव रखें। कल्पना करें कि माँ की शक्ति आपके भीतर के भय, भ्रम, क्रोध और नकारात्मक भावों का संहार कर रही है। कुछ क्षण इसी भाव में रहें और अपनी चेतना को सजगता से अनुभव करें।
आज आज्ञा चक्र में ध्यान लगाकर माँ कात्यायनी, माँ महिषासुरमर्दिनी की ऊर्जा को महसूस किया जा सकता है।
जय माँ 🪷🙏
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