प्रथमम् शैलपुत्री
नवरात्रि का पहला दिन, मां शैलपुत्री की अराधना का दिन...
आओ माँ…
और ऐसे आओ,
चरणों में तेरे मेरा हाथ रहे,
और सर पर मेरे तेरा हाथ रहे।
जीवन में जब भी अनिश्चितता घेरती है, मन किसी ऐसे सहारे की तलाश करता है, जो उसे स्थिरता और विश्वास दे सके। पेड़ की शाखाएँ कितनी ही ऊँची क्यों न हों, उनका टिके रहना भी पेड़ की जड़ों की मजबूती पर निर्भर करता है।इसी तरह जीवन में टिके रहने के लिए भी अपनी आस्थाओं, मूल्यों और आत्मविश्वास से जुड़े रहना जरूरी है।
प्रथमम् शैलपुत्री…
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
माँ शैलपुत्री का पर्वत-सा दृढ़ स्वरूप हमें यही सिखाता है कि जीवन में ऊँचाइयाँ छूने से पहले अपनी जड़ों को मजबूत करना जरूरी है। जब भीतर विश्वास की नींव मजबूत होती है, तब बाहरी परिस्थितियाँ हमें आसानी से विचलित नहीं कर पातीं।
आज मूलाधार चक्र पर ध्यान लगाकर माँ के इस स्वरूप से जुड़ी स्थिरता, सुरक्षा और दृढ़ता के भाव को अनुभव करने का प्रयास करें।
जय माँ🌺 🙏
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