कूष्मांडेति चतुर्थकम्
नवरात्र का चौथा दिन, कूष्माण्डा मां का स्वरूप और अनाहत चक्र पर ध्यान।
रचनात्मकता में प्राण ऊर्जा है। यह तब महसूस होती है, जब भटकाव खत्म हो जाता है। हमारी ऊर्जा कब, कहाँ और किस तरह लग रही है, यह इस पर निर्भर करता है। अगर हम अपनी ऊर्जा को व्यर्थ खर्च कर रहे हैं, शिकवे-शिकायत, निंदा-चुगली, तुलना आदि में जाया किए दे रहे हैं, तो हम भटकाव की अवस्था में जी रहे होते हैं और रचनात्मकता से दूर होते जाते हैं। धीरे-धीरे हमारे भीतर का रचयिता दम तोड़ देता है।
इसलिए अपनी प्राण ऊर्जा को बचाए रखिए और उसे सही जगह खर्च करके कुछ रच दीजिए। कुछ भी नहीं, तो अपनी दिनचर्या में ही रचनात्मक रहिए।
कूष्माण्डेति चतुर्थकम्...
सुरासंपूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च...
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे..!
आज अनाहत चक्र पर ध्यान लगाकर माँ कुष्मांडा की ऊर्जा को महसूस किया जा सकता है।
अनाहत चक्र ध्यान
आराम से बैठकर आँखें बंद करें और अपनी साँसों पर ध्यान ले आएँ। साँस को सहज रूप से आते-जाते महसूस करें और कुछ क्षण मन को शांत होने दें।
अब छाती के मध्य, हृदय के पास अनाहत चक्र पर ध्यान केंद्रित करें। कल्पना करें कि वहाँ हरे रंग का प्रकाश फैल रहा है, जो आपके भीतर प्रेम, करुणा और सहज आनंद का संचार कर रहा है।
मन ही मन अनुभव करें कि आपकी प्राण ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो रही है और आपके भीतर का रचयिता जागृत हो रहा है। माँ कुष्मांडा से प्रार्थना करें कि वे आपकी ऊर्जा को रचनात्मकता और शुभ कर्मों में लगाने की प्रेरणा दें।
जय माँ 🙏
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