Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

ग़ज़ल

Reactions 0
Comments 0
796
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

सीख

Reactions 0
Comments 0
795
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

चिंता:कविता

Reactions 0
Comments 0
769
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

कविता

Reactions 0
Comments 0
840
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

कविता:आदत

Reactions 0
Comments 0
788
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 0 mins read
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

गज़ल

Reactions 0
Comments 0
807
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

व्यंग्य

Reactions 0
Comments 0
711
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

कविता

Reactions 0
Comments 0
795
Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

उद्धव-कृष्ण संवाद

उद्धव ने कृष्ण से पूछा, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया! लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं ? उसे एक आदमी घसीटकर भरी सभा में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है! एक स्त्री का शील क्या बचा ? आपने क्या बचाया ? क्या यही धर्म है ?" ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं! उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए। भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले- "प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है। उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं। यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।" उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा। जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता ? पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार? चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की! और वह यह- उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए! क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं! इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी! इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!

Reactions 0
Comments 0
952