"दशहरे का राज"
रामराज्य की कल्पना साकार करने हेतु सदैव ही हम आकांक्षी रहते हैं। दशहरे के पुण्य पर्व पर सत पर अस्त की जीत याद दिलाने आता है यह पर्व।
आदत............
आबो हवा बदलने के लिए, ख्वाहिश का ज़िंदा होना चाहिए, जब खुश है इक्मिनान के साथ, तो जीने को भला और क्या चाहिए.
रात तू इतनी...................
कभी तो तू भी सोया कर, छुप जाती है जब सूरज के पीछे, तब खुद की भी आवाज़ सुन लिया कर.
यादों की याद.............
हर मोड़ पर हर उम्र में कोई ना कोई मिल ही जाता है, एक ऐसा दोस्त जो सवाल नहीं करता, केवल साथ निभाता है.
ज़रूरत है खुद की......................
खुद के साथ दोस्ती कर लो, फिर किसी और की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, भटकते रहोगे साथी की तलाश में, अंत में खुद से ही बातें होगी.
खौफ हैं....................
ऐ दर्शाता है कि हम ज़िंदा है, माना कि ड़रते है बहुत चाज़ों से हम, लेकिन इसमें कोई शक नहीं, कि खौफ सिखाता है हमें कि क्या करना है या क्या नहीं.
ज़िन्दगी.................
उलझनों से जोड़ती है, आज़ादी कहती तो है, मगर कैद मेंं रहना पसंद करती है.
निर्वाणषट्कम् (आत्मषट्कम्)
निर्वाणषट्कम् (आत्मषट्कम्) आदिगुरु शंकराचार्य की विश्वास प्रसिद्ध कृति है। आदि गुरु शंकराचार्य के अपने गुरु बाल शंकर से सर्वप्रथम भेंट के अवसर पर उनके गुरु ने उनसे कहा की तुम्हारा परिचय क्या है, तुम कौन हो ? इस पर जो शंकराचार्य जी ने उत्तर दिया वही निर्वाण षट्कम के नाम से विख्यात है। यह आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित एक सुंदर कविता है।
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