Hijabi soldier

Aaysha khan
13 Jul, 2020 • 1 min read min read • hi
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Hijabi soldier



हेलो दोस्तों मैं आयत खांन एक बार फिर हाज़िर हूं अपनी नयी कहानी 'हिजाबी सोल्जर" को लेकर अब आप कहेंगे कितना अजीब नाम है ये "हिजाबी सोल्जर" तो इसके लिये चलो चलते हैं, पढ़ते है पूरी कहानी आखिर है क्या .....


ये उन दिनों की बात है जब औरतें महज़ चूला-चौख़ा संभालने , बच्चे पैदा करने का साधन मात्र हुआ करती थीं । अपनी हवस बुझाने , एक मजदूर सा काम लेने के अलावा औरतों को पैर की जूती समझा जाता था । तब देश की सीमा के समीप जन्मी एक नन्ही कली कुछ अलग ही सपने लिये बैठी थी , जब सीमा की रखवाली करते फौजीयों के क्वाटरों का चलन चला ही था उसमें उसके , बाबा माली के रूप में कार्यरत् थे । उसके बाबा महमूद इलाही ओर नन्ही कली हामिला की ज़िंदगी उन्ही क्वाटरों के इर्द-गिर्द गुज़र रही थी । बदनसीब हामिला छः साल की उम्र में बीते बरस अपनी माँ को एक हादसे में खो बैठी , तबसे उसके बाबा ही उसकी माँ ओर उसके जीने का सहारा बने । एक अच्छी परवरिश करने अपनी बेटी को सारी खुशी देने के लिये महमूद इलाही बगीचों की देख-रेख के साथ अब क्वाटरों की साफ-सफाई भी करने लगा । बेटी हामिला अपने बाबा के पास क़ुरान शरीफ़ पढ़ती , फौजीयों के बच्चों के साथ स्कूल जाती , पर जिस उम्र में उन फौजीयों के बच्चे गुड्डे-गुड़ियों , गाड़ियों से खेला करते हामिला कुछ अलग ही मिजाज़ लिये थी । उसे इन गुड्डे-गुड़ियों , गाड़ी का कोई शोक़ नहीं था । वह रोज़ाना अपने बाबा से पतंगें मंगवाती ओर उनके कागज़ों को फ़ेक निकली पिंचियों ओर धागे से तीर-कमान बनाती ओर दिन-भर निशानेबाजी करती । कभी पेड़ से फल तोड़ना , कभी पेड़ पे बैठे गिरगिट को भगाना , तो कभी अपने बाबा के सिर पर मिट्टी का गोला बना उसे गोपना । हामिला का बचपन से एक ही दोस्त था जिसका नाम उमंग था , वो आर्मी के चीफ़ मजिस्ट्रेट का बेटा होने पर भी ज़र्रा बराबर रौब़ ना खाता । ईद पर वो हामिला की सिवईं खाता तो दिवाली पर दोनो साथ पटाख़े जलाते । वक़्त बदला साल बदले ना बदला तो हामिला ओर उसकी निशानेबाजी का अटूट रिश्ता । उमंग ओर हामिला उसी ज़माने में देश की टाॅप यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हुये उसके तुरंत बाद ही उमंग को आर्मी मे भर्ती व देशसेवा का अवसर प्राप्त हुआ ओर वह देशसेवा में तल्लीन हो गया । हामिला अब एकदम अकेली घुट-घुट कर अपना जीवन व्यतीत करने लगी।

कभी उसने अपने पंख फैलाने की कोशिश भी करी तो छोटी सोच के लोग , औरतों को मात्र श्रृंगार , घूँघट में देखने की वासना रखने वाला समाज उसे वापिस ज़मीन पर ला खड़ा करता ।

कुछ समय बाद उमंग अपनी छुट्टियां बिताने अपने घर आया ही था की सरहद पर रंजिश का माहौल पूरे वतन को झंकझोरने लगा तभी उमंग को उसके साथी सरहद पे तैनात होने ख़ातिर लेने आ गये । उमंग सबसे मिलकर रवाना हुआ पर वो इस बात से अंजान था कि हामिला कुछ अलग ही सोच लिये बैठी थी । वे तैनात सिपाहियों की गाड़ी में बैठ सरहद तक आ पहुंची अपनी देशसेवा की ललक उसे यहां तक ले आई रात बीत गई । सवेरे-सवेरे एक सिपाही हामिला को पीछे से दबोच मेजर के पास ला खड़ा करता है तरह-तरह की आवाज़ो से हामिला डरी सहमी चुप-चाप खड़ी सब सुनती जा रही थी । कोई उसे सीमा के उस तरफ से आई जासूस बुला रहा था तो कोई डाकुओं की सरदारनी । इन सारे फसादों से अंजान उमंग कड़क लथड़ाती आवाज़ में बोलता है मैं लाया हूं इसे , इसका इस दुनिया में कोई नहीं । इसे मरे जाने का कोई डर नहीं ओर खाना बहोत मज़ेदार बनाती है वहां बताता तो कोई राज़ी नहीं होता अब कम कम अच्छा खाने को तो मिलेगा कुछ इस तरह की मिन्नतों के बाद उबला-फ़ीका खाना खा-खाकर ऊबे सिपाही उसे रखने को राज़ी हो गये ।

हामिला नाराज़ उमंग को मनाने आती है वहीं गुस्से में आग बबूला उमंग ; तुम्हे मरने से डर नहीं लगता , क्यूं आई हो यहां जैसे ही मौका मिलेगा मैं खुद तुम्हे छोड़ आऊंगा तब तक टैंट से बाहर नहीं निकलोगी , ओर मेरी ये बंदूक हमेशा साथ रखोगी ऐसा कहकर गुस्से में पैर ठोक निकल गया ।

रात्री का भोजन कर थके सिपाही अपने-अपने टैंट में आराम कर रहे थे तो कुछ रखवाली पे तैनात थे ।रात्री की मजधार में सरहद पार से अचानक गौलियों की बौछार ने सिपाहियों के टैंट को छलनी कर दिया ।सैकड़ों सैनिक घायल सवेरे तक लड़ते रहे । हामिला टैंट से बाहर ना निकली । दोनों तरफ सिपाहियों की लाशें बिछ गईं । सैकड़ो सैनिक शहीद हो गये पर सरहद पार से गोलियों की बौछार थम न रही थी । बेबस हामिला से अब बर्दाश्त न हुआ अपने वतन के जवानों को यूं तड़पता देख टैंट से बाहर , कमर पे गोलियों की पट्टी , दोनों हाथों में बंदूक लिये डटकर दुश्मनों का सामना करने आ खड़ी हुई ।उस दिन मानो उसकी आंखो में माँ काली की ज्वाला संपूर्ण रूप से दिखाई पड़ी हो । दोनो तरफ के सिपाही उसके रणचण्डी अवतार को देख स्तब्ध रह गये । हामिला के इस रूप को देख बचे सिपाहियों मे भी जौशीला व्यक्तित्व उभरा ओर सीमा-पार के दुश्मनों को उन्होंने ढ़ेर कर दिया ।

दूसरे दिन अख़बार मे वतन की जीत से ज़्यादा एक नारी के सरहद पर जंग लड़ने का बोल-बाला हो रहा था । हर समाचार , वी•सी•आर• , रेडियो पर हामिला के चर्चे ।कुछ इस तरह के संघर्ष से हामिला ओर उस जैसी कई लड़कियों के जज़्बे को सराहा गया ओर उन्हें आर्मी भर्ती का सौभाग्य प्राप्त होने लगा ।हामिला अब महिला आर्मी डिपार्टमेंट की हेड है ।

मज़हब की दीवार लाँघ उमंग ओर हामिला पवित्र बंधन में बंध देशसेवा में तल्लीन हैं ।


उपर्युक्त कहानी महिलाओं मे कुछ कर दिखाने , आत्मशक्ती को जागृत करने , स्वयं को कमज़ोर न समझने की भावना रखने के लिये लिखी एक काल्पनिक रचना है । किसी विशेष वर्ग को ऊंचा दिखाने या किसी धर्म जाती के व्यक्तिव को ठेस पहुंचाना इस कहानी का अभिप्राय नहीं है



_written by_

Ayat khan@itsmywritee





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Aaysha khan

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  • Harsh Raghuwanshi · 6 years ago last edited 6 years ago

    Superb yarr, i like your writing .. ? ?

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