मेरी राख: एक सफर
राकेश मृत्यु के बाद अपनी ही राख के सफर का साक्षी बनता है। जलगाँव में शरीर जलता है, फिर राख के तीन हिस्से — जन्मस्थान की नाराज़ नदी, पुणे के पुल पर बहा अधूरा इश्क़ और मुंबई के समंदर में विलीन अहंकार। आखिरी राख बेटा गुरुस्थान की मौन मिट्टी में बिखेरता है, जहाँ राकेश समझता है — मीटिंग, जायदाद, प्रेम सब रेगिस्तान में 'ओसिस' जैसा भ्रम था, सच तो शून्यता है।
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आज सुबह उठा तो शरीर बेहद हल्का लग रहा था। सोचा, शायद रात भर नींद अच्छी आई है, इसलिए इतना ताज़ा महसूस कर रहा हूँ। उठकर खिड़की का पर्दा हटाया और बाहर भागती हुई दुनिया के दर्शन किए। पर जब पलटकर देखा, तो मैं अपने ही बिस्तर पर लेटा हुआ था। थोड़ा अचंभित हुआ। अपने शरीर में वापस प्रवेश करने की कोशिश की, पर असफल रहा।
तभी एक झटके में समझ आया—मैं इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह चुका हूँ।
एकदम से पास रखी कुर्सी पर बैठ गया। मेरा शरीर मेरे सामने बिस्तर पर शांत पड़ा था, और मैं जिस्म से बाहर। अचानक मुझे अपने सारे अधूरे काम याद आने लगे। मेरी मीटिंग्स, मेरा प्रमोशन, मेरा सेट किया हुआ टाइम-टेबल... सब धरा का धरा रह गया। आज ही तो इंश्योरेंस एजेंट को बुलाया था; टर्म प्लान की सारी बातें वो समझा चुका था, बस आज उसे चेक देना था। बड़ी बहन के साथ जायदाद का मसला भी चल रहा था, सोचा था इस दिवाली उसे बुलाकर वो सब हल कर लूँगा और हम साथ मिलकर दिवाली मनाएंगे। पर मौत ने किसी भी योजना का इंतज़ार नहीं किया।
तभी मेरे बेडरूम का दरवाज़ा खुला और मेरी पत्नी अंदर आई। मुझे न जागता देख उसने आवाज़ें दीं। मेरा कोई जवाब न पाकर वो चीख पड़ी और बेटे को बुलाने लगी। बेटा दौड़ा-दौड़ा आया, मुझे जगाने की कोशिश करने लगा। शोर सुनकर पड़ोस से डॉक्टर देसाई आ गए। उन्होंने मेरी नब्ज़ देखी।
तभी डॉक्टर देसाई ने गंभीर स्वर में कहा,
"माफ़ करें भाभी, राकेश हमें छोड़कर हमेशा के लिए चला गया है।".और पूरे घर में रोना-चिल्लाना शुरू हो गया।
भटकाव और राख के हिस्से
आज मुझे गए हुए तीन दिन हो गए हैं, पर मैं घर में ही इधर-उधर भटक रहा हूँ। मृत्यु के बाद जो आम तौर पर सुना था, वैसा मेरे साथ कुछ नहीं हो रहा था। न कोई मृत्यु का देवता मुझे लेने आया, न कोई दूत। मैं समझ रहा था कि इसमें ज़रूर कोई राज़ है।
कुछ साल पहले, जब मेरी सास का देहांत हुआ था, तो हम उनकी अस्थियां लेकर हरिद्वार गए थे। तब बातों-बातों में मैंने अपनी पत्नी से कहा था, "अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरी अस्थियों के हिस्से करना। एक मेरे जन्मस्थान पर, एक पुणे में और एक मुंबई के समंदर में।"
जहाँ मैं रहता था, उस जलगाँव की चिता ने तो मेरे शरीर को जलाकर अपना हिसाब पूरा कर लिया था। देह अब राख बन चुकी थी। अब जो बची हुई राख थी, वह केवल उन जगहों का कर्ज चुकाने के लिए थी जहाँ मेरी रूह के कुछ हिस्से अटक गए थे।
पहला हिस्सा: जन्मस्थान और नदी का ताना
आज मेरी अस्थियां मेरे जन्मस्थान ले जाई जा रही थीं। वहाँ एक छोटी सी नदी है, उसमें प्रवाहित करने के लिए। सारे सफर में गाड़ी में सन्नाटा था। पत्नी बार-बार आँखें पोंछ रही थी और मैं खामोशी से सब देख रहा था।
जैसे ही गाड़ी ने मेरे जन्मस्थान की सीमा में प्रवेश किया, मुझे सब याद आने लगा—वो क्रिकेट का मैदान, वो स्कूल, वो कॉलेज... सब कुछ। सारा परिवार अस्थियां लेकर उतरा। नदी की धार मंद थी। पर आज नदी जैसे मुझसे नाराज़ थी। ये वही नदी थी जहाँ हम न जाने कितनी बार गणपति विसर्जन के लिए आए थे, बरसात में बाढ़ आने पर किनारे बैठे थे।
जैसे ही मेरी राख पानी में डाली गई, नदी ने नाराज़ होकर मुझे आवाज़ दी:
अब आया है? कितने सालों बाद मुझे और अपने शहर को देखने मिला... वो भी इस रूप में! क्या यही बनने के लिए गया था अपना शहर छोड़कर? राख बनने के लिए?"
मैंने कुछ कहा नहीं। मैंने बोझिल आँखों से अपने शहर और अपनी उस नदिया को अलविदा कहा।
दूसरा हिस्सा: पुणे, पीएमटी (PMT) की बसें
अगला पड़ाव पुणे था। जैसे ही गाड़ी ने पुणे की सीमा में प्रवेश किया, यादों के बंद दरवाज़े अपने आप खुलने लगे। यह वो शहर था जहाँ मैंने ज़िंदगी की रफ़्तार को पहली बार पकड़ा था। मेरा वो दफ़्तर, मेरा वो छोटा सा कमरा, और पीएमटी (PMT) की बसों की वो भीड़—सब आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह चलने लगा। वो पुणे स्टेशन, जहाँ रातों को दोस्तों के साथ यूं ही भटकना... सब कितना अपना सा था।
और फिर... वो। मेरी प्रेमिका। उसकी शादी इसी शहर में, किसी और के साथ हुई थी। आज जब मेरी राख इस शहर से गुज़र रही थी, तो न चाहते हुए भी मेरी रूह की आँखें उस ट्रैफ़िक और अनजान भीड़ में उसे ही खोज रही थीं।
अचानक, पुणे के उस जाने-पहचाने ट्रैफ़िक में गाड़ी रुकी। हम पुणे की नदी वाले एक पुल के ऊपर खड़े थे। मेरे बेटे ने कलश खोला और मेरी राख का दूसरा हिस्सा उस पुल से नीचे पानी में छोड़ दिया।
जैसे ही वह राख पानी में मिली, मुझे लगा जैसे मेरे वो सारे सपने, पीएमटी के वो सफर, वो रातें, और वो अधूरा इश्क़—सब कुछ उस पानी के साथ हमेशा के लिए बह गया। नदी खामोश थी, जैसे बता रही हो कि प्रेम और यादें भी पानी की तरह ही होती हैं... जिन्हें मुट्ठी में बांधा नहीं जा सकता।
तीसरा हिस्सा: मुंबई, सपनों की दौड़ और समंदर की शालीनता
पुणे के उस पुल से आगे बढ़ने के कुछ देर बाद ही, मुंबई की उस अथाह भीड़ और अंतहीन शोर ने मेरी यादों का सिलसिला एक झटके में तोड़ दिया। कानों में वही चिर-परिचित लोकल ट्रेन की 'धड़-धड़' गूंजने लगी, और सपनों के पीछे बेतहाशा भागती हुई दुनिया सामने आ गई।
कुछ ही देर में हम उस विशाल अरब सागर के किनारे खड़े थे। मेरे बेटे ने भारी मन से कलश में से मेरी राख का तीसरा हिस्सा निकाला और उसे उस असीम समुद्र के हवाले कर दिया।
जन्मस्थान की नदी ने मुझे शिकायत भरा ताना मारा था, पर इस समंदर ने ऐसा कुछ नहीं किया। सागर ने बहुत ही शालीनता से मेरी उस मुट्ठी भर राख को अपनी अथाह गहराई में समा लिया। उसकी लहरें जैसे एक खामोश सच्चाई बयान कर रही थीं— "कितने बड़े-बड़े सपने लेकर आए थे इस शहर में... पर देखो, अंत में खाली हाथ ही चले गए।"
मुंबई की जिस भागदौड़ में मैंने अपना सारा जीवन खपा दिया, वह इस समंदर के आगे एक तिनके से ज़्यादा कुछ नहीं थी। और मैं? मैं बस एक मूक दर्शक बनकर वहाँ खड़ा था, सबको रोते हुए देख रहा
चौथा हिस्सा: गुरुस्थान, बेटे की समझ और वो 'ओसिस'
मुंबई के समंदर में राख मिलने के बाद मुझे लगा कि अब सब खत्म हो गया है। पर जब मैंने देखा कि कलश में अभी भी थोड़ी सी राख बाकी थी, तो मैं गहरी सोच में पड़ गया कि यह किसलिए बाकी है?
अगले दिन शाम को, जब मेरा बेटा वह कलश लिए उस ट्रेन में बैठा जिससे हम अक्सर मेरे गुरुस्थान जाया करते थे, तब मैं खुद अपने बेटे की सोच पर हैरान रह गया।
मेरे गुरु... जो मेरे सब कुछ थे। मैं उन्हें भूलने की गलती भला कैसे कर सकता था? वे ही तो थे जिनकी वजह से मैं इस दुनिया को समझ पाया था। मेरे बेटे ने मेरे कहे बिना ही मेरी रूह की आखिरी ज़रूरत को समझ लिया था।
ट्रेन के उस सफर के बाद जब हम गुरुस्थान पहुँचे, तो वहाँ का वातावरण दुनिया के हर शोर से अलग था।
वहाँ कोई भव्य आश्रम नहीं था। न कोई मूर्ति थी, न अगरबत्ती का कोई धुआँ, और न ही पूजा-पाठ का कोई शोर। वहाँ था तो बस एक गहरा, अनंत मौन। मेरे बेटे ने बिना किसी कर्मकांड के, खामोशी से वह कलश खोला और मेरी राख का वह आखिरी हिस्सा गुरुस्थान की उस सादी और शांत मिट्टी में बिखेर दिया।
जैसे ही मेरी राख उस निराकार (formless) जगह की मिट्टी में मिली, एक अद्भुत शांति ने मुझे घेर लिया। जन्मस्थान की नदी, पुणे का वो पुल और मुंबई का समंदर—ये सब किसी न किसी आकार या रिश्ते से जुड़े थे। लेकिन मेरे गुरु के उस बिना मूर्ति वाले स्थान ने मुझे पूर्ण 'शून्यता' में विलीन कर दिया।
और तब, उस पूर्ण शून्यता के बीच मुझे इस ब्रह्मांड का वो आखिरी सच समझ आया।
मेरी वो अधूरी मीटिंग्स, वो टर्म प्लान का चेक, मेरी बहन से जायदाद का वो झगड़ा, पुणे का वो अधूरा इश्क़, और मुंबई के समंदर में बहा मेरा वो अहंकार—यह सब असल में क्या था?
यह सब बस एक 'ओसिस' (Oasis) था। एक मृगतृष्णा।
हम ज़िंदगी के इस विशाल रेगिस्तान में, रिश्तों और महत्वाकांक्षाओं की उस छोटी सी झलक को ही अपनी पूरी दुनिया मान बैठते हैं। हम भूल जाते हैं कि ओसिस में कोई हमेशा के लिए नहीं ठहर सकता। ज़िंदगी सिर्फ एक खूबसूरत धोखा थी, जो अब पीछे छूट गई थी।
गुरुस्थान की उस सादी मिट्टी में मिलते ही, मैं उस ओसिस के भ्रम से हमेशा के लिए आज़ाद हो गया।
अब कोई भटकाव नहीं था।
अब कोई 'राकेश' नहीं था।
बस एक असीम, अनंत मौन था... और मैं उस शाश्वत शांति में हमेशा के लिए विलीन हो चुका था।
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