मीरदाद से मुलाकात: सवालों का समुंदर
लेखक को 'मिरदाद की किताब' पढ़ने के बाद सपने में मिरदाद मिलता है। मिरदाद समझाता है कि किताबें समुंदर जैसी हैं, जितना गहरा जाओगे नया अर्थ मिलेगा। हर व्यक्ति कर्मों के हिसाब से जीवन में आता है। उसका काम था सोई हुई चेतनाओं को जगाकर ईश्वर तक पहुँचाना।
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अगर आपने 'मिरदाद की किताब' पढ़ी है, तो यह मुलाकात आपको पहले से ही जानी-पहचानी लगेगी।
म कई रातों से 'मिरदाद की किताब' पढ़ रहा था।
यह किताब रहस्यों से भरी हुई है। कई जगहों पर इसके अर्थ इतने गहरे हैं कि आपको बहुत धैर्य से पढ़ना पड़ता है। हर बार पढ़ने पर एक नया अर्थ निकलता है। मैंने इसे चार बार पढ़ा है।
देर रात जब किताब खत्म हुई, तो मेरा मन कई सवालों से गूंज रहा था। इन अनुत्तरित सवालों के जवाब मुझे कहाँ मिलेंगे? यह सब सोचते-सोचते न जाने कब मेरी आँख लग गई।
सुबह अचानक मुझे तेज ठंड महसूस हुई।
मई के महीने में इतनी ठंड? इस ख्याल से मेरी आँख झटके से खुल गई। मैंने खुद को एक बहुत अजीब जगह पर पाया; शायद यह कोई पुराना मठ था। मैंने आँखें मलीं और चारों ओर देखा। वहाँ आधुनिक जीवन का कोई निशान नहीं था। कोई शोर नहीं, कोई मशीन नहीं।
ठीक मेरे सामने एक आदमी बैठा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी, उसने बहुत पुराने कपड़े पहने हुए थे, और उसकी आँखों में एक गहरी शांति और कृपा थी जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
मैं घबरा गया और पूछा, "भाई आप कौन हैं? और मैं यहाँ कहाँ आ गया हूँ?"
गहरी, शांत मुस्कान के साथ उसने जवाब दिया, "तुम जवाब चाहते थे न? मैं ही तुम्हें तुम्हारे सारे जवाब देने वाला हूँ।"
मेरी घबराहट और बढ़ गई। मैंने फिर पूछा, "पर आप हैं कौन?"
हल्की हँसी के साथ उसने कहा, "मैं... मैं मिरदाद हूँ।"
मैं पूरी तरह सन्न रह गया। मिरदाद? घबराहट में मैंने खिड़की से बाहर झाँका। मैं बहुत ऊँचे पहाड़ पर बने एक एकांत मठ में था। नीचे सिर्फ बादलों का समुंदर था। मेरे पैर काँपने लगे और मैं जमीन पर बैठ गया।
मेरी बेचैनी देखकर उस व्यक्ति ने बहुत शांत आवाज में कहा, "मैंने तुम्हें यहाँ सिर्फ जवाब बताने के लिए बुलाया है। अपने जवाब ले लो, फिर मैं तुम्हें वापस तुम्हारी दुनिया में भेज दूँगा।"
कुछ हिम्मत जुटाकर मैंने उससे कहा, "आपकी बातें बहुत गहरी हैं। हर बार आपकी किताब पढ़ने पर मुझे एक नया अर्थ मिलता है। ऐसा क्यों होता है?"
मिरदाद ने अपनी गहरी आँखों से मुझे देखा और शांति से पूछा, "क्या तुमने कभी समुंदर देखा है?"
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
फिर मिरदाद मुस्कुराया और बोला, "किताबें और सत्य भी समुंदर की तरह ही हैं। समुंदर में तुम जितना गहरा जाओगे, उतने ही नए रूप मिलेंगे। हर नई गहराई में... एक अलग दुनिया, एक अलग अर्थ बसता है।"
"भाई, मैं तुम्हें यहाँ ज्यादा देर नहीं रोकूँगा। अब एक-एक करके वो सारे सवाल पूछो जो तुम्हें उलझाए हुए हैं।"
मैंने खुद को संभाला और अपना पहला सवाल पूछा, "शमदम... जो इस मठ का मठाधीश था, उसे इतनी बड़ी सजा क्यों दी गई? हमें तो यह भी नहीं पता कि वह अब मुक्त हो गया है या अभी भी अपनी सजा काट रहा है। उससे इतनी नफरत क्यों?"
उसने बहुत शांत आवाज में जवाब दिया, "नफरत? मैं किसी से नफरत नहीं करता। अगर नफरत होती तो मैं उसे गले क्यों लगाता? बात बस इतनी सी है कि जब तुम किसी मठ के मुखिया होते हो, तो तुम्हारी जिम्मेदारी सबसे बड़ी होती है।"
उसने मेरे चेहरे का भाव पढ़ा और कहा, "अगर कोई अनजान आदमी चोरी करे तो उसकी क्या सजा होगी?" मैंने कहा, "कुछ दिन जेल।"
उसने तुरंत दूसरा सवाल पूछा, "और अगर एक पुलिसवाला चोरी करे तो?"
"तब भी जेल," मैंने हिचकिचाते हुए कहा।
मिरदाद मुस्कुराते हुए समझाने लगा, "अदालत उस अनजान आदमी की सजा एक बार कम कर सकती है या उसे माफ भी कर सकती है, क्योंकि शायद वह अज्ञानी है। पर पुलिसवाला तो कानून को पूरी तरह जानता है, है न? अज्ञानी आदमी को माफ किया जा सकता है, पर जो सब कुछ जानता है, जो खुद रक्षक है, उसे कैसे माफ किया जा सकता है?"
"शमदम मुखिया था, मठाधीश था। उसे सब पता था कि यह मठ किस उद्देश्य से बनाया गया था। अगर कोई और गलत कर रहा था तो उसे रोकना और सही रास्ता दिखाना मठाधीश का काम था। पर अगर मठाधीश खुद ही गलत करने लगे... अगर वह मठ की कृपा और शांति को धंधा बना दे, तो खुद बताओ - क्या उसे सजा मिलनी चाहिए या नहीं?"
मैंने पूछा, "जब आप मठ में गए तो आपको पहले प्रवेश क्यों नहीं दिया गया? उस समय आप क्या सोच रहे थे?"
शांति से उसने कहा, "दुनिया हर अजनबी के साथ यही करती है।"
मैंने तुरंत कहा, "पर नूह ने तो उनसे कहा था कि जब एक साथी चला जाएगा तो ईश्वर उसकी जगह दूसरा भेजेगा, फिर आपको क्यों मना किया गया?"
उसने जवाब दिया, "क्या तुम किसी भी अजनबी को देखकर बस मुस्कुरा देते हो? या कभी-कभी अजनबी को देखकर गुस्सा भी आता है?"
मैंने कहा, "हाँ, कभी-कभी ऐसा होता है।"
फिर उसने कहा, "अगर तुमने बैंक से लोन लिया हो और लेने जाते समय तुमने कुर्ता-पायजामा पहना हो, पर अब तुमने पहनना बंद कर दिया हो, तो क्या बैंक तुम्हें पहचानेगा नहीं?"
मैंने कहा, "पहचानेगा।"
फिर वह मुस्कुराया और बोला, "यही सार है। हमारे जीवन में जो भी आता है - कोई भी दोस्त, दुश्मन, शुभचिंतक - उसके साथ हमारा कोई कर्मों का हिसाब होता है। कोई भी बिना कारण हमारे जीवन में नहीं आता। माता-पिता, पत्नी, बच्चे, तुम्हारा शहर, बॉस, नौकरी - सब कुछ। यह हमारे पिछले जन्मों के हिसाब से आता है ताकि कर्मों का हिसाब चुकता हो सके।"
"मठ में रहने वाले सभी लोगों का कर्म उन्हें वहाँ ले आया और मुझे भी उसी समय वहाँ जाना था ताकि मैं उन्हें जगा सकूँ। जहाँ तक मेरे मन में क्या चल रहा था, मुझे अपना लक्ष्य पता था। मैं जानता था कि वे सभी अंधे हैं और मुझे उन्हें अज्ञान के अंधकार से बाहर निकालना है। मेरे मन में सभी के लिए केवल करुणा और प्रेम था।"
मैंने फिर पूछा, "जब आपको वहाँ मठ में प्रवेश मिला तो आप कई दिनों तक चुप क्यों रहे?"
वह हँसा और बोला, "जब भी कोई व्यक्ति किसी नई जगह जाता है - चाहे वह दफ्तर हो या कोई और जगह - वह पहले उस जगह और वहाँ के लोगों को समझने की कोशिश करता है। मुझे तो वहाँ सिर्फ एक नौकर के रूप में प्रवेश मिला था, तो एक नौकर आते ही ऐसी रहस्यमयी बातें कैसे कह सकता था?"
"जैसे इतिहास का शिक्षक अपनी क्लास में तभी पढ़ाने जाता है जब उसका पीरियड होता है। अगर मैं जाते ही सबको सब कुछ बता देता तो मठाधीश तुरंत मुझे बाहर का रास्ता दिखा देता। इसीलिए मैंने कुछ समय लिया और सही समय चुना जब सभी एक साथ हों।"
"मेरी चुप्पी के पीछे एक और कारण था। अगर कोई नया व्यक्ति किसी नई जगह जाकर तुरंत अपने विचार थोपने लगे तो लोग सोचते हैं कि वह अहंकारी है। इसके विपरीत अगर कोई कम बोले और ज्यादातर चुप रहे तो लोगों के मन में उसके बारे में जिज्ञासा पैदा होती है। कहते हैं न, शरीर चाहे जितना ढक लो, तुम्हारी असली गहराई तुम्हारी जुबान ही बताती है।"
मैंने पूछा, "जब राजकुमार के सिपाहियों ने आपको बंदी बनाया तो उस समय आप क्या सोच रहे थे? और आपने उस राजकुमार को कुछ ही दिनों में कैसे बदल दिया?"
उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "इस ब्रह्मांड में सबसे ऊँचा 'दिव्य ज्ञान' है। जैसे तुम हर सुबह अपने काम पर जाते हो, क्या दिन में कठिनाइयाँ नहीं आतीं? तो क्या तुम उन कठिनाइयों से डरकर अपना काम अधूरा छोड़कर भाग जाते हो? मैं भी बस अपना काम कर रहा था जो ईश्वर ने मुझे सौंपा था - दिव्य ज्ञान के माध्यम से लोगों की चेतना को जगाना।"
"और जहाँ तक राजकुमार के बदलने की बात है, मैंने उसे बस यही समझाया कि इस दुनिया की हर दौलत और हर ताकत उस भीतरी शांति और दिव्य ज्ञान के सामने बहुत छोटी और तुच्छ है। अगर तुमने बाहर सब कुछ पा लिया पर अपनी आत्मा का सौदा कर दिया, तो अंत में तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगेगा।"
मैंने पूछा, "मियेकान के सपने के बारे में जो मैंने सुना - उस मठ में इतने सारे शिष्य थे - तो सिर्फ उसी को वह सपना क्यों आया? और आपने सभी को 'महान लालसा' के बारे में क्यों समझाया? आपको कैसे पता चला कि उसने सपना देखा है?"
यह सुनकर मिरदाद पहले जोर से हँसा, और फिर शांत होकर बोला -
"जैसे एक बड़ा मेन कंप्यूटर होता है और पचास छोटे कंप्यूटर इंटरनेट के जरिए उससे जुड़े होते हैं, तो क्या बड़े कंप्यूटर को आखिरी कंप्यूटर पर हो रही हर गतिविधि का पता चल जाता है या नहीं?"
मैंने कहा, "बिल्कुल चलता है।"
फिर मिरदाद ने कहा, "मैं ही वह इंटरनेट हूँ जो हर आत्मा और हर चेतना से जुड़ा हुआ है। मुझे मेरी हर आत्मा की खबर है। हर जीव क्या अनुभव करेगा, उसके सपने क्या हैं - यह सब मुझे उतना ही साफ दिखाई देता है जैसे किसी पारदर्शी काँच की बोतल में रखी हुई कोई चीज।"
"जहाँ तक यह बात है कि वह सपना सिर्फ मियेकान को ही क्यों आया? तो समझो कि हर आत्मा की अपनी अलग यात्रा होती है। मान लो, एक बस एक शहर से सुबह 8 बजे निकलती है और 24 घंटे में 1200 किलोमीटर तय करती है, और दूसरी बस उसी शहर से रात 8 बजे निकलती है - तो क्या वह तुरंत पहली बस के बराबर दूरी तय कर लेगी? हर किसी की अपनी यात्रा है और हर किसी की अपनी गति है।"
"जहाँ तक मठ की बात है, वहाँ अध्यात्मिकता लंबे समय से सिर्फ नाम की रह गई थी। उस पूरे मठ में शायद मियेकान अकेला था जिसकी चेतना इतनी गहरी थी कि वह वह सपना देख सका। और जहाँ तक 'महान लालसा' की बात है - इसी महान लालसा के कारण ईश्वर मनुष्य के सबसे करीब होता है।"
मैंने अपना आखिरी सवाल पूछा, "सभी साथी आपके साथ थे, आप चाहते तो वहाँ के मठाधीश बन सकते थे, फिर आपने वह मठ क्यों छोड़ दिया?"
इस सवाल पर मिरदाद जोर से हँसा और बोला, "तुम्हें मेरी वह किताब एक बार फिर ध्यान से पढ़नी चाहिए। मैं उस मठ में किसी पद पर बैठने के लिए नहीं गया था, बल्कि उसे उसके बोझ से मुक्त करने - वहाँ मौजूद सभी लोगों की चेतना को जगाने और उन्हें प्रकाश का मार्ग दिखाने गया था।"
"एक छोटी सी कहानी सुनो - एक आदमी एक नौकर रखता है और उसे काम देता है कि वह हर सुबह आकर भेड़ों को गिने, उन्हें चराने ले जाए, और शाम को वापस गिनकर मालिक को सौंप दे।"
"उसी तरह मेरे मालिक, यानी ईश्वर ने, जितनी भेड़ें मुझे सौंपी थीं, मैंने उनकी चेतना को जगाया और उन्हें साथ लेकर ईश्वर को सौंप दिया। यही मेरा एकमात्र काम था। जिनकी चेतना जाग गई, उन्हें मैं अपने साथ ले गया; और जिनकी चेतना नहीं जागी, यानी शमदम, उसे वहाँ किताब की रखवाली के लिए छोड़ दिया।"
अचानक मुझे कुछ गर्मी महसूस हुई। सिर उठाकर देखा तो मैं अपने ही बिस्तर पर था। सुबह के 6 बज रहे थे और किताब मेरी छाती पर खुली पड़ी थी।
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