अंतिम संस्कार : लकड़ी
यहाँ इस कहानी का सबसे छोटा और सधा हुआ सार (Summary) है: यह कहानी एक रिटायर्ड प्रोफेसर और उनके बचपन के दोस्त (एक पेड़) की मार्मिक विदाई है। सालों बाद गाँव लौटने पर प्रोफेसर को पता चलता है कि हाईवे बनने के कारण कल उस पेड़ को काट दिया जाएगा। पेड़ बिना किसी शिकायत के अपनी मौत को स्वीकारता है और प्रोफेसर से अपना 'अंतिम संस्कार' करने को कहता है। अंत में, प्रोफेसर उसे काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। वे कुल्हाड़ी का लोहे वाला हिस्सा (जो मारने का प्रतीक है) वहीं छोड़ देते हैं और महज़ **लकड़ी का डंडा** अपने साथ ले आते हैं—ताकि उनका दोस्त हमेशा के लिए उनके साथ रह सके।
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"यहाँ छत पर कब तक यूँ ही चक्कर लगाते रहोगे?" पीछे से मेरी पत्नी की आवाज़ आई।
मैं पलटा, तो वह दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने आगे कहा, "बॉटनी के प्रोफेसर के रूप में आपका तीस साल का कार्यकाल कितना शानदार रहा। कल ही आप रिटायर हुए हो, और आज यूनिवर्सिटी ने वनस्पति शास्त्र में आपके शोध और उम्र भर के काम के लिए आपको इतने बड़े सम्मान से नवाज़ा है। अब एक सुकून भरी रिटायरमेंट की ज़िंदगी आपका इंतज़ार कर रही है... अब भला और क्या बाकी रह गया है?"
मैंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "नहीं, अब कुछ बाकी नहीं... बस एक पुराने दोस्त से मिलने जाना है।"
"किस दोस्त से? और कहाँ?" उसने हैरानी से पूछा।
मैं छत की मुंडेर से दूर आसमान को देखते हुए पुरानी यादों में खो गया। मैंने गहरी सांस ली और कहा, "तुम्हें पता है, जब मैं आठ साल का था, तब पिताजी ने मुझे एक किस्सा सुनाया था। उन्होंने बताया था कि कैसे आचार्य जगदीश चंद्र बोस ने लंदन में दुनिया के सामने यह साबित कर दिया था कि पेड़-पौधों में भी हमारी तरह ही जान होती है। बस, उसी दिन मेरे बाल-मन ने यह तय कर लिया था कि मुझे बड़े होकर बॉटनी में ही कुछ करना है।"
मैं कुछ पल रुका और फिर बोला, "उसी उम्र में, मैंने एक बीज लिया और हमारे गाँव की सड़क के किनारे, जो घर से कुछ दूरी पर थी, उसे बो दिया। मैं रोज़ दिन में चार बार उसे पानी देने जाता। अगले दस सालों तक, जब तक कि वह थोड़ा बड़ा नहीं हो गया, मेरा यही नियम रहा।"
मेरी आँखों के सामने वो बचपन तैरने लगा। "जानती हो, मुझे लगता था जैसे वह मुझसे बातें करता है। कई बार चिलचिलाती दोपहर में मुझे ऐसा लगता जैसे वह मुझे बुला रहा हो, कह रहा हो— *'मुझे प्यास लगी है'*। मैं घर से एक छोटी बाल्टी में पानी भरता और नंगे पैर भागते हुए उसके पास जाता। पीछे से माँ चिल्लाती रहती, *'इतनी तेज़ धूप है, मत जा!'* पर मुझे कहाँ कुछ सुनाई देता था। गर्मियों में मुझे सच में उसकी प्यासी आवाज़ सुनाई देती, सर्दियों की तेज़ ठंड में जैसे मुझे उसके ठिठुरने का अहसास होता, और बारिश में तो वह जैसे खिल उठता और मुझसे कहता— *'आ, खेलते हैं!'*"
मेरी पत्नी अब शांति से मेरी बातें सुन रही थी। मैंने आगे कहा, "एक बार की बात है, शाम काफी ढल चुकी थी और मैं उस छोटे से पेड़ के पास बैठा था। तभी माँ पीछे से आई और मुझे पीटने लगी। वो डांटते हुए कह रही थीं कि शाम के वक्त पेड़-पौधों के पास नहीं जाते। मार मुझे पड़ रही थी, मैं रो रहा था... पर उस एक पल में, मुझे पूरी शिद्दत से यह महसूस हुआ कि दर्द उसे भी हो रहा है। जैसे मैं रो रहा था, वैसे ही वह भी मेरे साथ रो रहा था। उस दिन के बाद से उसके और मेरे बीच एक बहुत गहरा, अनकहा रिश्ता बन गया।"
मैं हल्का सा हँसा, "माँ को तो लगने लगा था कि मुझे कोई साया लग गया है या किसी भूत ने पकड़ लिया है, क्योंकि अपना सारा खाली वक्त मैं उसी के पास जाकर बिताता था। फिर वक्त बीता, मैं बड़ा हुआ, पढ़ाई के लिए शहर चला आया, और यहीं का होकर रह गया।"
मैंने अपनी पत्नी की तरफ देखा और कहा, "अब वक्त ही वक्त है, तो सोचता हूँ कि जाकर अपने उस दोस्त से मिल आऊँ। इसी बहाने दो दिन गाँव में चाचा जी से भी मुलाकात हो जाएगी।"
***
अगले आठ दिनों तक यूनिवर्सिटी के साथी, साथ काम करने वाले और छात्र लगातार मिलने आते रहे। बधाइयों और मुलाकातों का यह सिलसिला खत्म हुआ, तो एक रात मैंने पत्नी से कहकर अपना बैग तैयार करवा लिया और सुबह निकलने का मन बना लिया।
सुबह की पहली बस पकड़ी। उबड़-खाबड़ रास्तों से होती हुई बस गाँव की तरफ बढ़ रही थी। रास्ते में कई जगह काम चल रहा था, भारी मशीनें लगी थीं और धूल उड़ रही थी। किसी ने बताया कि वहाँ 'राष्ट्रीय राजमार्ग' का काम शुरू हो गया है।
करीब पाँच घंटे के थका देने वाले सफर के बाद, दूर से गाँव नज़र आने लगा... और नज़र आया मेरा वह दोस्त! इतने सालों में वह एक विशाल दरख्त बन चुका था।
जैसे ही मैं बस से उतरा और उस पेड़ के पास पहुँचा, एक अजीब सी बात हुई। हवा का कोई तेज़ झोंका नहीं था, फिर भी उसकी टहनियों में अचानक हलचल होने लगी और ढेर सारे छोटे पत्ते टूटकर मेरे ऊपर गिरने लगे। लगा जैसे वह बरसों बाद अपने पुराने दोस्त का स्वागत कर रहा हो।
मैंने उस मौन स्वागत का सम्मान किया और धीरे से आगे बढ़कर उसके खुरदरे तने पर अपना हाथ रख दिया।
अचानक मुझे अपनी हथेली पर एक अजीब सी नमी महसूस हुई। वो शायद उसके खुशी के आँसू थे। मेरी आँखों की कोरें भी अपने आप भीग गईं। मैं बिना कुछ कहे वहीं उसकी घनी छाँव में नीचे बैठ गया।
तभी, जैसे मेरे भीतर उस चिर-परिचित आवाज़ ने दस्तक दी—
*"कैसे हो परदेसी? जाते वक्त एक बार मिले भी नहीं, और अब इतने सालों बाद आ रहे हो?"*
मैं क्या जवाब देता? माँ को यह पक्का यकीन हो चुका था कि मुझ पर कोई साया पड़ गया है या किसी भूत ने मुझे जकड़ लिया है, क्योंकि उन्होंने मुझे तीन-चार बार उस पेड़ के सामने बैठकर बातें करते हुए देख लिया था। इसी डर से उन्होंने मुझे पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया था। और तो और, मुझे भेजने के लिए गाँव का दूसरा रास्ता चुना गया था, ताकि मैं जाते-जाते भी अपने इस दोस्त से न मिल सकूँ।
मैंने बात टालने के लिए बस इतना पूछा, "क्या... तुम्हें मेरी याद नहीं आई?"
मेरे इतना कहते ही, ऊपर से एक छोटी सी टहनी टूटकर सीधे मेरे ऊपर आ गिरी। जैसे वह नाराज़ होकर मुझे मार रहा हो और कह रहा हो— *"यह भी कोई पूछने वाला सवाल है?"*
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा दोस्त, माफ़ कर दो! मैं तो यूँ ही मज़ाक कर रहा था। एक काम करते हैं, हम वैसे ही बातें करते हैं जैसे बचपन में किया करते थे। तुम नाराज़ होगे, तो कोई टहनी गिरा देना। खुश होगे, तो टहनियाँ हिला देना। किसी चीज़ के बारे में बताना हो, तो एक पत्ता गिरा देना... और अगर कोई गहरी बात कहनी हो, तो सीधे मेरी रूह को छूकर बोलना।"
इतना सुनते ही उसकी टहनियाँ खुशी से हिलने लगीं। फिर हवा का एक हल्का सा झोंका आया और एक पत्ता टूटकर सामने की छोटी सी हार्डवेयर की दुकान पर टंगी एक कुल्हाड़ी पर जा गिरा।
मैंने पूछा, "उस दुकान के बारे में बात करनी है?" टहनियाँ फिर से हिलने लगीं। तभी एक और पत्ता उड़कर उसी कुल्हाड़ी पर गिरा। मैंने ध्यान से देखा। वहाँ तीन-चार कुल्हाड़ियाँ टंगी थीं। गौर करने पर मेरी रूह काँप गई—उन कुल्हाड़ियों के डंडे उसी पेड़ की लकड़ी से बने थे।
तभी एक पत्ता पेड़ के तने पर मौजूद एक गहरे ज़ख्म—कुल्हाड़ी के वार के निशान—पर आ गिरा। जैसे वह मुझे अपने ज़ख्म दिखा रहा हो। मैंने भारी आवाज़ में पूछा, "ये कुल्हाड़ियाँ... तुम्हारी ही लकड़ी से बनी हैं?" टहनियों ने हिलकर हामी भरी।
मैं खामोश हो गया। बचपन में जब मुझे मार पड़ी थी, तो दर्द इसे भी हुआ था। पर अब इतने सालों तक, अपने ही जिस्म के टुकड़ों से बने हथियारों का वार इसने अकेले सहा था। मैंने रुँधे गले से कहा, "मुझे माफ़ करना, दोस्त..." उसने टहनी हिलाकर जैसे मुझे माफ़ कर दिया।
फिर अगला पत्ता पास की एक छोटी सी चाय की दुकान की मेज़ पर गिरा, और दूसरा पत्ता नाई की दुकान की पुरानी कुर्सी पर। मैंने अचरज से पूछा, "क्या यह मेज़ और कुर्सी भी तुम्हारी ही लकड़ी से बनी है?" उसने फिर टहनी हिलाकर हामी भरी। मैं सकते में था। जिन लोगों को उसने बरसों अपनी घनी छाँव में आसरा दिया, छोटा सा व्यवसाय चलाने की जगह दी, उन्होंने ही उस पर वार किए थे।
शर्म और अफसोस से मेरी आँखें झुक गईं। मैंने कहा, "दोस्त, मैं शर्मिंदा हूँ।" कोई जवाब नहीं आया, पर एक छोटी सी सूखी टहनी मेरे ऊपर आ गिरी। शायद वह जता रहा था कि जब उसे मेरी मदद की आवश्यकता थी, तब मैं वहाँ नहीं था, इसलिए वह अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर रहा था। मैंने नम आँखों से उसके खुरदरे तने पर हाथ फेरा।
तभी एक हरा पत्ता धीरे से मेरे हाथ पर आकर गिरा। शायद वह मेरी भावनाएं समझ रहा था और मुझे दिलासा दे रहा था।
मैंने गहरी सांस ली और कहा, "अब मैं दो दिन के लिए यहाँ आया हूँ। अपना ज़्यादातर वक्त तुम्हारे ही साथ बिताऊँगा।"
तभी एक पत्ता उड़कर सड़क पर खींची गई सरकारी सफेद मार्किंग पर जा गिरा, और एक दूसरा पत्ता वहाँ लगे एक बड़े से बोर्ड पर गिरा, जिस पर अब तक मेरा ध्यान नहीं गया था।
मैंने आँखें पोंछीं और उठकर उस बोर्ड के पास गया। उसे पढ़ते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह सरकारी नोटिस बोर्ड था। उस पर लिखा था कि इस रास्ते को 'राष्ट्रीय राजमार्ग' के अंतर्गत चौड़ा और पक्का किया जाएगा। सभी दुकानदारों को अतिक्रमण खुद हटाने का आदेश था, और ज़मीन समतल करने के लिए उस पेड़ को भी गिराया जाना था।
मेरा दिल बैठ गया। मेरी भावनाओं का बाँध टूट गया और आँसू बह निकले। मैं मुड़ा और भागकर पेड़ के तने को अपने आलिंगन में ले लिया। तने पर महसूस हो रही नमी मुझे और भी विवश कर रही थी। इसका मतलब था कि कल सुबह मेरे इस दोस्त का नामोनिशान खत्म हो जाएगा।
मैं वहीं आवेश में ज़मीन पर धम्म से बैठ गया। मेरी रूह से एक चीख सी उठी— *"काश! काश मैं यहाँ पहले आ पाता!"*
शायद मेरे उस दोस्त ने मेरी रूह की वह पुकार सुन ली थी। अगले ही पल, मेरे अंतरमन में उसकी वह शांत आवाज़ बिल्कुल स्पष्ट सुनाई दी—
*"रोते क्यों हो, मेरे दोस्त? इस संसार चक्र में जो आया है, वो जाएगा ही।"*
मेरे भीतर पसरे सन्नाटे में वह आवाज़ गूँजती रही। *"पर मुझे खुशी इस बात की है कि अपने अंतिम समय में, मैं अपने इस पुराने दोस्त से मिल पाया। मैं खुशी-खुशी कल यहाँ से चला जाऊँगा। मुझे किसी से कोई शिकवा नहीं है... न उस चाय वाले से जिसने मेरे नीचे भट्टी जलाई, न उस नाई से जिसने मेरे तने पर सालों तक अपना शीशा टाँगा, और न ही उस हार्डवेयर वाले से जिसने मुझ पर लोहे की कीलें ठोकीं। मैंने खुले दिल से इन सबको माफ कर दिया है। कम से कम मैं किसी के काम तो आया। लेकिन दोस्त... मेरी एक अंतिम इच्छा है।"*
"क्या...?" मैंने भर्राई हुई आवाज़ में पूछा।
मैंने सकते में आकर ऊपर की ओर देखा। हवा का एक हल्का सा झोंका आया और एक पत्ता उड़ता हुआ करीब सौ फीट दूर, गाँव के श्मशान की छत पर जा गिरा। मेरी आँखों के सामने अँधेरा सा छाने लगा। तभी दूसरा पत्ता उड़कर ठीक उस जगह जा गिरा, जहाँ चिता जलाई जाती है। वहाँ इस वक्त कोई चिता नहीं जल रही थी, बस राख का एक ढेर था।
मैं एकदम सन्न रह गया। मुझे उस मौन का अर्थ समझ आ गया था। मेरा वह दोस्त, वह पेड़ मुझसे कह रहा था कि 'मेरा अंतिम संस्कार तेरे हाथों से हो।' वह चाहता था कि जिन हाथों ने उसे बोया था, वही हाथ उसे इस शरीर से मुक्ति दें।
मैंने रोते हुए ज़ोर-ज़ोर से 'ना' में सिर हिलाया। ऐसा कैसे हो सकता था? तभी अचानक से ढेर सारी छोटी-छोटी टहनियाँ और पत्ते मुझ पर गिरने लगे। जैसे वह मुझसे मिन्नतें कर रहा हो, मुझे मना रहा हो।
मैं ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा।
मेरे सुन्न दिमाग ने कुछ फैसला किया। मैं उठा, पास की उस हार्डवेयर की दुकान पर गया और एक कुल्हाड़ी खरीद ली। मैंने सोचा, इससे पहले कि कोई और मशीन या ठेकेदार आकर इसे बेरहमी से काटे, मैं खुद ही अपने दोस्त को आज़ाद कर दूँगा। मैं कुल्हाड़ी लेकर सड़क की दूसरी ओर खड़ा हो गया। मेरे हाथ काँप रहे थे।
तभी हवा तेज़ हुई और दो-तीन बड़े पत्ते उड़कर सीधे मेरे मुँह के पास आकर गिरे। जैसे वह मुझे रोक रहा हो... कह रहा हो कि 'इतना बड़ा बोझ अपने दिल पर मत ले, मेरे दोस्त।' तभी मुझे वापसी की बस आती हुई दिखाई दी। उसी पल एक ज़ोर की आवाज़ हुई और पानी के फव्वारे उड़ने लगे। मैंने मुड़कर देखा, पेड़ के पास लगे पीने के पानी के नलके के नीचे से उस पेड़ की एक मोटी जड़ अचानक बाहर की ओर उखड़ गई थी, जिसकी वजह से पाइप फट गया था और पानी चारों तरफ फव्वारे की तरह उड़ने लगा था।
यह कोई इत्तेफाक नहीं था। वह मेरा रास्ता रोक रहा था, वह आखिरी बार मुझे भिगो रहा था, जैसे बचपन में हम बारिश में खेलते थे।
बस आकर रुकी। मैंने भारी मन से कदम बढ़ाए और बस में चढ़ गया। मैं अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। मेरी गोद में सिर्फ उस कुल्हाड़ी का वह लकड़ी का डंडा था। मैंने लोहे का हिस्सा वहीं छोड़ दिया था।
मैं जा रहा था, लेकिन मेरी गोद में रखे उस 'लकड़ी' के डंडे के रूप में, मेरा वह दोस्त हमेशा के लिए मेरे साथ आ रहा था।
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