शिव
This poetry depicts the greatness of lord shiv
शिव मनमोहक हैं,सुन्दर है, विशाल है
भांग, धतूरा, शहद, दूध, भस्म से होता श्रृंगार है
मुख पे स्वर्णिम मुस्कान है
जटाओं में गंगा, गले में वासुकि का नाग है
पैर में खड़ाऊं, गले में विष का प्याला है
मेरा भोला सबसे निराला है
वो अर्धनारी है
मैथुनी सृष्टि के निर्माणकारी हैं
जिससे की सृष्टि चलती हमारी है
गर्भवती को सताया तो बनोगे पाप के भागीदारी
त्रिनेत्र खुले तो बन जाये विनाशकारी
डमरू बजे तो प्रलयकारी
इनके क्रोध के आगे कोई टिका नहीं
निर्दोष कभी झुका नहीं
पापी कभी बचा नहीं
जिसकी हुंकार से मिटता अहंकार है
हे शिव तुझे प्रणाम है
-ईशान श्रीवास्तव
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