असुरक्षा की भावना मन में भय उत्पन्न करती है | मन से भय कैसे मिटे |
इस एहसास को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों
के माध्यम से साझा कर रहा हूँ
जब वक़्त कहीं पे जाए ठहर,
और घुप्प अँधेरा हो जाए |
जब लगे जहाँ सूना सूना,
न कुछ सूझे न कुछ भाये ||
ओ परमपिता के अंश कभी,
तुम मत डरना मत घबराना |
बस अंतर्मन के दीपक से,
सब रौशन रौशन कर देना ||
तुम बुद्धिमतों की न सुनना,
ये तो बस भ्रम फैलाएंगे |
ये इधर उधर की बातों में,
भटकायेंगे भरमाएंगे ||
तो जब भी घना अँधेरा हो,
जीवन को दुखों ने घेरा हो |
मन में बैठे उस ईश्वर से ,
मांगो की जल्द सवेरा हो ||
✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवि • लेखक
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