हां मैं हूं घमंडी

दुख के बाद सुख में तो घमंड करने का अधिकार है

Varsha Sharma
19 Dec, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 0 👁 757
##culture
हां मैं हूं घमंडी

Photo by Jon Tyson on Unsplash

" जी बिल्कुल गुप्ता जी आप की बेटी बहुत खुश रहेंगी

, " और आज रिश्ता पक्का हो गया

सभी को विदा करने के लिए बाहर तक आई थी, शोभा

सोचा पड़ोस में मिठाई भी दे दूं तो वह मिठाई देकर वापस जा रही थी| ,"लड़के तो बहुत अच्छे हैं इसे उन पर घमंड है पर......


देखो तो कैसे मटक मटक कर चल रही है????जैसे किसी राज्य की रानी हो पति को छोड़कर तो आ गई, अगर इतनी ही अच्छी होती तो आज अपने घर में निभा रही होती ,"

पति को छोड़ कर अकेले नहीं रह रही होती, "

शोभा को देखकर आस पड़ोस की औरतें व्यंग कसने लगी|

शोभा को भी पता था कि उसके पीठ पीछे औरतें उसे घमंडी कह कर बुलाते हैं |

कभी-कभी तो शोभा को लगने लगता कि बच्चों पर घमंड करती है तो कहीं कोई पाप तो नहीं कर रही......


लेकिन फिर सोचने लगी

सुंदर थी तो इसमें उसकी तो कोई गलती नहीं थी सूरत के साथ-साथ सीरत भी भगवान की दया से अच्छी ही पाई थी |

लेकिन यही सुंदरता उसके लिए अभिशाप बन गई पति ने लोगों के बहकावे में आकर उस पर शक करना शुरू कर दिया और कितना समझाने के बाद भी उसके मानसिक दशा खराब ही होते गई अंत में जुएं और शराब की लत और लग गई जिससे शोभा का परिवार गर्त में जाने लगा ........शोभा के पास दो ही विकल्प थे

या तो पति को छोड़कर अलग रहे या फिर जैसे चल रहा है वैसे चलने दे!!!!!!दोनों बच्चे भी बड़े हो रहे थे दोनों बेटे सब कुछ समझते थे, एक दिन बड़े बेटे ने गुस्से में आकर नशे की अवस्था में पिता पर हाथ उठा दिया |

एक तरीके से तो सही था ,अपनी मां को कष्ट सहते हुए नहीं देख पा रहे थे लेकिन मां कैसे अपने बच्चों को बिगड़ते हुए देख ले ........ बच्चे का हाथ उठाना मां को अंदर तक झकझोर गया कि अब अगर ज्यादा देर होगी तो कल को एक और बच्चा ऐसा ही मैं भी तैयार कर दूंगी, ", जो बात बात पर हाथ उठाएगा यह हम बच्चों को क्या सिखा रहे हैं? ?? ? ना चाहते हुए भी कोई औरत नहीं चाहती घर उजाड़ ना लेकिन उसके पास अगर कोई विकल्प ही ना बचे तो....


उसी समय निर्णय लिया अलग रहने का.....हां पास में पैसे नहीं थे नौकरी ढूंढ सकती थी लोगों ने कहा कि रूप पर ज्यादा घमंड है या फिर इसके संबंध गलत हैं लेकिन उसे सिर्फ अपने बच्चों के बारे में सोचना था | क्योंकि यह लोग तो सिर्फ बातें बनाने के लिए आते हैं मुसीबत में कोई काम नहीं आता|

और वह अलग हो गई |

आज दोनों बेटे बहुत अच्छी पोस्ट पर हैं दोनों की शादी की बात चल रही है बस शोभा यह चाहती है कि अपने पिता के उन गलत संस्कारों से दूर एक औरत को ये खुशी प्रदान करें!!!!

आसपास की औरतों का बोलना जारी था

तभी वहां पर शर्मा आंटी आ गई जिनके सामने शोभा की पूरी जिंदगी बीती थी तब उन्होंने कहा कि तुम औरत होकर औरत को कैसी बातें कह रही हो?????क्या तुम उसके कष्ट के समय उसके साथ थी?????नहीं तो फिर तुम्हें उसे घमंडी कहने का कोई हक नहीं यह घमंड उसने अपनी मेहनत से पाया है.......शोभा भी बोली कि" अगर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देना और उन्हें अच्छे से पालन पोषण करना घमंड है तो हां मैं घमंडी हूं, "


कई बार हम किसी को देखकर अपनी धारणा बना लेते हैं जबकि हमने नहीं देखा कि उसने अपना समय किसदुख में गुजारा, और अगर आप सही हैं खुश है तो आपको दूसरों की मानसिक स्थिति को समझना चाहिए और जरूरी नहीं सभी वैवाहिक जीवन खुशहाल होते हैं कुछ वैवाहिक जीवन मुश्किलों से भरे हुए भी होते हैं|

आप अगर उसी स्थिति में होते तो आप क्या निर्णय लेते यही सोच कर सामने वाले के विषय में सोचें.. . ...


क्योंकि हर औरत एक मां होती है और मां चाहती है कि उसके बच्चे संस्कारी बने

0 likes
☕

Support Varsha Sharma

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Varsha Sharma
Published By

Varsha Sharma

@varshau8hkd

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Relationship
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

365 0
More stories in Relationship
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

463 0
More stories in Relationship
Ruchika Rai • 19 Mar, 2023 • 0 mins read min

लिव इन के प्रति राय

लिव इन

717 0
More stories in Relationship
Kumar Sandeep • 22 Feb, 2023 • 1 min read min

प्रार्थना यही है ईश्वर से

Dad please come back

927 1