कभी ये धड़कनों में सौ-सौ तूफ़ान भरती है,
या फिर ये दिल को कभी सुनसान करती है,
देती तो है सुकून बिन माँगे भी कभी-कभी ये,
या कभी जेहन में, जुनूनी-सा उफ़ान भरती है,
मिलते ही महबूब से जब जग ये थम-सा जाए,
थमे लम्हों में फिर होश का नुकसान करती है,
ढलने लगते हैं जब भी पल उनसे मुलाक़ात के,
घड़ी की टिक-टिक से बेवज़ह परेशान करती है,
बातें लबों से न होकर, आँखों से जब होने लगे,
अनबुझे जज़्बात बयाँ करना, आसान करती है,
दिखने लगती है जब यार में ही, ज़िंदगानी सारी,
मतलबी दुनिया में ऐसी जादूगरी, हैरान करती है,
मंज़िल, राहें एक हो जाती हैं, दो अजनबियों की,
जोड़ उन्हें जज़्बातों से, उन पर एहसान करती है,
मिला देती है उन्हें, जो थे अधूरे एक-दूजे के बिना,
बनाकर हमसफ़र उन्हें, सफ़र में नई जान भरती है,
भर देती है ये फिर ज़िंदगी को, इक नए एहसास से,
तन्हा सूने पड़े लम्हों में ये मुकम्मल मुस्कान भरती है,
पूछता हूँ मैं ख़ुद से ही “साकेत”, ऐसा होता है क्यों,
दिल कहता है, आशिक़ी ऐसे ही तो उड़ान भरती है।
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