और अधिक
और अधिक पाने की लालसा पर मेरी कविता
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और अधिक..थोड़ा और अधिक के पीछे भागती ये दुनिया।
जाने कब और कहाँ रूकेगा ये अभिलाषा पूर्ण सा नजरिया।।
पद-प्रतिष्ठा,धन-दौलत,मान-सम्मान भरी बेइंतहा चाहतें।
कितना भी जुटा लो सुख-सुविधाएं पर न मिलेंगी राहतें।।
मर-मरकर इक-इक पूँजी को हसरत से समेटना-सहेजना।
न चैन से जीना न चैन से रहना बस हर वस्तु को चाहना।।
न ये दौलत न ही ये शोहरत साथ मरकर साथ ऊपर जाएगी।
जी लो इस बहुमूल्य जीवन को क्षण-क्षण उमर घट जाएगी।।
प्रेम उमंग तरंग इस मानव जीवन का सही सच्चा सार है।
खो दोगे यह बेशकीमती क्षण यह जीवन की बड़ी हार है।।
धन्यवाद
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