Preeti Malik
24 Sep, 2026
आक्रामक
हर बार चुप रह जाना,
हर दर्द को सह जाना—
क्या यही मजबूरी है?
क्या खामोशी ही ज़रूरी है?
जब हद से बढ़ जाए ज़ुल्म,
तो आवाज़ उठानी पड़ती है,
अपने सम्मान की खातिर
दीवारें गिरानी पड़ती हैं।
मैं आक्रामक हूँ—
अन्याय के सामने,
झूठ के विरुद्ध,
और उस सोच के खिलाफ़
जो मेरी खामोशी को कमजोरी समझे।
क्योंकि याद रखना—
खामोश इंसान जब बोलता है,
तो सिर्फ़ आवाज़ नहीं उठती…
एक पूरा अस्तित्व जागता है।
Paperwiff
by preetimalik
24 Sep, 2026
aggressive
Comments
Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓
No comments yet.
Be the first to express what you feel 🥰.
Please Login or Create a free account to comment.