भारत और चीन

Baikunth prasad
02 Oct, 2019 1 min read min read hi
❤️ 0 💬 0 👁 707
भारत और चीन

 विषय की शुरुआत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से करना चाहूंगा

    चीन के हजारों वर्ष का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है मैं उस पर टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा परंतु चीन की 19वीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी की घटनाएं 21वीं शताब्दी में चीन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका का निर्धारण करती है

     यूरोपीय शक्तियों ने चीन को अपना उपनिवेश बनाया और उसके संप्रभुता की बुरी तरह से धज्जियां उड़ाई इन्हीं वर्षों में ब्रिटेन ने चीन के साथ अफीम का व्यापार शुरू किया और चीन की जनता में अंग्रेजो के खिलाफ जनाक्रोश बॉक्सर विद्रोह को एक विस्फोटक संकट बना दिया इस बगावत का बलपूर्वक दमन कर अंग्रेजों ने यह दर्शा दिया कि चीन की हालत ठीक नहीं

   परंतु सन यात सेन ने जिस राष्ट्रवादी क्रांति को 1911 में संपन्न किया उसने राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

1905 में रूस को एक सैनिक मुठभेड़ में हराने के बाद जापान में साम्राज्यवादी मानसिकता तेजी से विकसित हुई और जापान में चीनी सीमा का अतिक्रमण करना प्रारंभ कर दिया जापानियों का प्रतिरोध करने में तत्कालीन चीनी सरकार असमर्थ साबित हुई सन यात सेन की मृत्यु के बाद उनके द्वारा स्थापित कू मिन तांग राष्ट्रवादी पार्टी का नेतृत्व च्यांग काई शेख के हाथों में आया जो अमेरिका से प्रभावित थे वह एक शक्तिशाली सेना नायक थे परंतु धीरे-धीरे चीन में गृहयुद्ध की स्थिति बनती गई तथा सन 1945 में माओ के नेतृत्व में साम्यवादियों ने धीरे-धीरे चीन के बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया तथा च्यांग काई शेख को चीन छोड़कर पड़ोसी द्वीप ताइवान में बसना पड़ा और तब से चीन में साम्यवादी शासन अस्तित्व में आया

    हमारे अधिकांश "PAPER WIFF" पाठकों को यह शायद ही पता हो कि चीन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी तो है ही साथ ही चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी वह अर्थव्यवस्था है जिसने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तथा महाशक्ति अमेरिका को कर्ज दे रखा है चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है वह सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य हैं एनपीपी के अनुसार चीन मान्यता प्राप्त परमाणु सक्ती है, सोवियत संघ के विघटन के पश्चात वह अमेरिकी एक ध्रुवीयता को चुनौती देने वाला प्रमुख देश है तथा महाशक्ति बनने का प्रबल दावेदार है,

      भारत के 1947 में स्वतंत्र होने और चीन में 1949 की क्रांति के बाद दोनों देशों में सहयोग की भावना देखी गई 1955-56 का दशक जिसमें हिंदी चीनी भाई भाई वाली गर्मजोशी देखने को मिली तथा दोनों देशों के बीच पंचशील समझौता हुआ और दोनों देशों ने बांडुंग में हुए एफ्रोएशियाई सम्मेलन में भाग लिया

    1957-58 तक यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि चीन हिमालय सरहद को विवाद ग्रस्त समझता है और जमीन के लाखों वर्ग किलोमीटर उस भू-भाग को अपना समझता है जिसे ब्रिटिश शासन काल के मानचित्र भारत का अभिन्न अंग समझते रहे हैं अनेक विद्वानों का मानना है कि यह सीमा विवाद ही भारत और चीन के बीच प्रमुख मुद्दा है और जब तक इसका समाधान नहीं होता तब तक दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होना असंभव है 

    हलाकी भारत नें उदारता दिखाते हुए तिब्बत पर चीन के अधिपत्य को भी स्वीकार कर लिया लेकिन इसके बाद भी चीन की नीतियों में आक्रामकता बनी रही और वह वन चाइना पॉलिसी को वरीयता देता रहा आगे चलकर जब भारत में फारवर्ड पॉलिसी का अनुसरण किया गया तो चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में चीन ने भारत के 1 बड़े भूभाग पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया इसलिए 1962 के बाद लंबे समय तक दोनों देशों के बीच स्थाई गतिरोध बना रहा

     सन 1962 में भारत चीन युद्ध में भारत की शर्मनाक हार हुई तथा इस युद्ध में तटस्थ देशों ने भारत के बजाय चीन का साथ देना सही समझा तथा इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारत चीन की बराबरी राजनयिक या सैनिक मोर्चे पर नहीं कर सकता

     सन 1962 से 1976 तक के दशकों में चीन ने भारत की घेराबंदी की तथा भारत के पारंपरिक शत्रु पाकिस्तान को अपने साथ लिया तब यह दौर भारत और चीन दोनों ही देशों में राजनीतिक उथल-पुथल वाला था

      भारत चीन संबंधों का अगला चरण वह था जिसमें पहले चीन ने आर्थिक उदारीकरण का मार्ग अपनाया और फिर भारत में चीन और भारत दोनों ही अब समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा की बेड़ियों से मुक्त होकर आर्थिक विकास का विकल्प चुन रहे थे जहां भारत नें यह काम बेहिचक जनतांत्रिक तरीके से किया वहीं चीन ने आर्थिक उदारीकरण के बावजूद साम्यवादी पार्टी की तानाशाही को जरा भी लचीला नहीं बनाया और तीन चार दशक तक स्थिति यही रही भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के निपटारे के लिए वार्ताओं के कई दौर चले पर कोई समाधान नहीं हो सका इसी बात को संतोषजनक समझा गया कि कम से कम छिटपुट घुसपैठ के अलावा कोई टकराव नहीं हुआ

    आज चीन जहां भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है वही रिश्तो में तनातनी भी देखने को मिलती रहती है डोकलाम विवाद इसका उदाहरण है इधर हमारे प्रधानमंत्री शी जिनपिंग के साथ झूला झूल रहे होते हैं उधर हमारे सैनिक चीन के सैनिकों के साथ धक्का-मुक्की कर रही होते हैं, सात आठ महीने तक लगातार जारी डोकलाम संकट नें यह बात साफ कर दी थी कि चीन के तेवर सी जिनपिंग के नेतृत्व में नरम नहीं बल्कि जुझारू ही रहने वाले हैं

     मित्रों अक्सर यह कहा जाता है कि अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान है मगर हकीकत यह है कि आज चीनी राष्ट्रपति ही दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान है अमेरिका भले ही दुनिया का सबसे ताकतवर देश हो मगर जहां तक चीन का प्रश्न है वह अमेरिका या शायद रूस की तुलना में भी कम ताकतवर हो जहां तक शी जिनपिंग का प्रश्न है वह अपने देश में एक छत्र सबसे अधिक ताकतवर नेता है उनकी तुलना अगर किसी से की जा सकती है तो रूस के पूतिन से

कृपया कमेंट करके अपनी राय अवश्य दें कि भारत चीन के साथ अपने संबंध कैसे बेहतर बना सकता है तथा चीन की आक्रामक नीतियों से कैसे निपट सकता है

     

0 likes

Support Baikunth prasad

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Baikunth prasad
Published By

Baikunth prasad

@baikunth

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Art
Sujit Kumar 12 Sep, 2025 3 mins read min

The Disastrous Impact of Government Corruption on National Stability

Corruption within government is not merely a moral weakness but a structural threat that destabilizes entire nations. It undermines public institutions, weakens economic progress, fuels inequality, and fosters political unrest. This paper explores the disastrous consequences of government corruption, including the erosion of trust, economic mismanagement, social injustice, international disrepute, and long-term damage to national development. The argument emphasizes that corruption, if left unchecked, can destroy the very foundations of a state and cripple future generations.

350 0
More stories in Art
fazal Esaf 02 Jun, 2025 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

448 0
More stories in Art
fazal Esaf 02 Jun, 2025 1 min read min

बेघर: एक परिवार की अनकही पीड़ा

यह कहानी शम्सुद्दीन साहब और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका पुश्तैनी घर, जो उनके जीवन का केंद्र था, को सरकारी बुलडोजर द्वारा बिना किसी चेतावनी के ढहा दिया जाता है। कहानी उनके दर्द, बेबसी और सदमे को बयां करती है। शम्सुद्दीन साहब और उनकी पत्नी, ज़ुबैदा खातून, अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ, अचानक बेघर हो जाते हैं। कहानी में उनके परिवार के सदस्यों की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं को दिखाया गया है - बच्चों का डर और भ्रम, ज़ुबैदा खातून का दर्द, और शम्सुद्दीन साहब का भीतर का संघर्ष। कहानी में यह भी दर्शाया गया है कि कैसे यह घटना सिर्फ एक घर का नुकसान नहीं है, बल्कि उनके सपनों, सुरक्षा और पहचान का भी नुकसान है। यह कहानी उन अनगिनत मुस्लिम परिवारों की पीड़ा को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर अन्याय और बेबसी का सामना करना पड़ता है, और उनकी उस भावना को व्यक्त करती है कि यह देश उनका भी उतना ही है, जितना किसी और का। कहानी में दर्द के साथ-साथ, फिर से खड़े होने और जीवन को फिर से शुरू करने की प्रेरणा भी है।

499 0
More stories in Art
fazal Esaf 28 May, 2025 1 min read min

इमरान की टोपी

"इमरान की टोपी" कोई साधारण कहानी नहीं, बल्कि एक आवाज़ है — उस अज़ान की, जो अब चुप हो गई थी। उस इमरान की, जो पहचान से डर गया था। टोपी सिर्फ़ कपड़े का टुकड़ा नहीं — वह इतिहास है, परंपरा है, और आत्मसम्मान है। जब समाज किसी की टोपी को शक की निगाह से देखता है, तब वह केवल इमरान को नहीं, इंसानियत को अपमानित करता है। इस देश के नागरिकों से मेरा प्रश्न है: क्या इमरान की टोपी फिर से गर्व से पहनी जा सकती है? क्या हम अपनी सोच की दीवारें गिरा सकते हैं — ताकि टोपी, तिलक, पगड़ी, सब मिलकर एक देश की पहचान बन जाएं? हमारा देश तभी महान बन सकता है, जब हर इमरान अपने नाम को सिर उठाकर कह सके — और उसकी टोपी सवाल नहीं, शान बने।

480 0