अस्तित्व

Aman G Mishra
15 Sep, 2019 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 0 👁 844
अस्तित्व

बात पिछले रविवार की है 1हम सब खाना खाने रात में रेसटूरेंट गए थे 1वहा काफी भीड थी 1 हम भी टेबल लेकर बैठ गए 1खाना आने मे समय लग रहा था 1हमलोग हसी मजाक कर रहे थे 1तभी हमारी नज़र पास बैठे एक बुजूर्ग पर पडी ,जो अपने बेटे के साथ खाना खाने आये थे 1उनकी उम्र काफी लेग रही थी 1वो खाना खाते समय गिरा गिरा कर खा रहे थे ,पार उनका बेटा जो काफी पढा लिखा प्रतीत हो रहा था 1बड़े आत्मीयता से और सम्मान से उन्हे खिला रहा था 1वो बड़े शांती से उन्हे खिला रहा था 1पास बैठे लोगो पर मेरी नज़र गयी जो बहुत एमबैरेस्ड महसूस कर रहे थे 1पार मैने देखा वो बेटा बहुत प्यार से उनके साथ व्यवहार कर रहा था 1खाना खाने के बाद वो उनको वाशरूम ले गया 1वह उनका शर्ट साफ किया और बाहर लेआया।यह देखकर सब हैरान थे कि आजकल के जमाने मे भी ऐसे लोग हैं। वह बिल चुकाया और उन्हे बडे प्यार से लेकर गया।पर कल हीं की बात है मैं अपने पापा के साथ 12 सितंबर को उनके जन्मदिन पर वृद्धा आश्रम गये थे। वहाँ मैंने उसी बुजुर्ग को देखा जिसे मैंने रेस्टोरेंट में देखा था।मुझे विश्वास नहीं हुआ।फिर भी मैं अपनी उत्सुकता को शांत करने के लिए उनके पास गयी।वो किनारे गुमसुम बैठे थे।उनकी आँखों मे आँसू थे।मैने उन्हें भी शाल दी जो हमलोग बाँटने के लिए ले गये थे।वो नहीं ले रहे थे,मुझसे रहा नहीं गया ,तो मैंने पूछ लिया आप रविवार को खाने गये थे क्या अपने बेटे के साथ,वो कुछ नहीं बोले।मैंने कहा वो आपका बेटा था न जो आपकी इतनी केयर कर रहा था।वो बहुत रोने लगे।मैंने कहा आप यहाँ कैसे?आपका बेटा तो कितना अच्छा है,वो मेरे पापा से बोले आप कभी भी अपनों का भरोसा न करना,न ही ं उनकी बातों मे आकर अपनी जायदाद उनके नाम करना।जबतक आपके पास ये रहेंगे आपको सब प्यार से पूछेंगे उसके देने के बाद कोई भी आपका नहीं। मेरे पापा ने कहा वैसे मेरे बेटा बहु बहुत अच्छे हैं।मैं भी यही सोचता था पहले,वो तो मुझे एक बच्चे की तरह बीमार होने पर दोनो बेटा बहु मेरी भी सेवा करते थे। पर जैसे हीं मैंने अपनी पूरी जायदाद उनके नाम कर दी,उन्होंने उसे किसी और के नाम करा बेच दिया।और खुद जर्मनी की कंपनी मे जाँब करने चले गये।बोले आप कहाँ जायेंगे आप यहाँ रहिए मैं जल्दी ही काम निपटा के आ जाऊँगा ,फिर हमलोग साथ रहेंगे।आप अकेले कैसे रहते इसलिए मैंने घर बेच दिया ऐसा मेरे बेटे ने कहा पर नहीं मुझे पता है वह नहींआयेगा।उसने मुझसे झूठ बोला है।ये सुनकर मैं अचंभित हो गयी ये दुनिया कैसी है।मैं अंदर तक हिल गयी।पर मेरे पापा भी न जाने कल से क्यों गुमसुम से हो गये?


ये कहानी हमें अपने अस्तित्व पर चिंतन करने पर मजबूर करती है क्यों कि कई बार हम दुनिया की चकाचौंध में इतने मशगूल हो जाते हैं कि स्वयं को और परिवार को भी भूल जाते हैं हम कितने ही दुनिया मे व्यस्त क्यो हों हमे खुद के अस्तित्व पर चिंतन करते रहना चाहिए।

0 likes
☕

Support Aman G Mishra

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Aman G Mishra
Published By

Aman G Mishra

@aman

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Non-fiction
Saurabh Kumar Gautam • 09 Apr, 2026 • 1 min read min

नई दुर्गा

अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए साहस जरूरी है, और रौशनी इसी साहस के कारण एक “नई दुर्गा” बनकर उभरती है।

196 0
More stories in Non-fiction
Adhiraj • 31 Oct, 2025 • 2 mins read min

कचरा

भेद भाव व असमानता अभी भी समाज को विभाजित किए हुए है | एक सत्य घटना पर आधारित लघु कहानी |

273 0
More stories in Non-fiction
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

362 0
More stories in Non-fiction
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

बेघर: एक परिवार की अनकही पीड़ा

यह कहानी शम्सुद्दीन साहब और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका पुश्तैनी घर, जो उनके जीवन का केंद्र था, को सरकारी बुलडोजर द्वारा बिना किसी चेतावनी के ढहा दिया जाता है। कहानी उनके दर्द, बेबसी और सदमे को बयां करती है। शम्सुद्दीन साहब और उनकी पत्नी, ज़ुबैदा खातून, अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ, अचानक बेघर हो जाते हैं। कहानी में उनके परिवार के सदस्यों की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं को दिखाया गया है - बच्चों का डर और भ्रम, ज़ुबैदा खातून का दर्द, और शम्सुद्दीन साहब का भीतर का संघर्ष। कहानी में यह भी दर्शाया गया है कि कैसे यह घटना सिर्फ एक घर का नुकसान नहीं है, बल्कि उनके सपनों, सुरक्षा और पहचान का भी नुकसान है। यह कहानी उन अनगिनत मुस्लिम परिवारों की पीड़ा को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर अन्याय और बेबसी का सामना करना पड़ता है, और उनकी उस भावना को व्यक्त करती है कि यह देश उनका भी उतना ही है, जितना किसी और का। कहानी में दर्द के साथ-साथ, फिर से खड़े होने और जीवन को फिर से शुरू करने की प्रेरणा भी है।

510 0