गीत सावन मन भावन
गीत: सावन मन भावन
तन में सावन मन में सावन।
झीलो नदियों बन में सावन।
खेत बाग में झिमिर झिमिर
बरसे घर कुॅजन में सावन।
तन में सावन मन......
रसिया बन कर घूम रहा है।
फसलों के संग झूम रहा है।
अम्बर से प्रियसी धरती के
अधरों को यह चूम रहा है।
धरती करे सिंगार निहारे
सुन्दरता दर्पन में सावन।
तन मे सावन।।।।।।।।।
फिसलन ही फिसलन होवे।
तन मन में मचलन होवे।
मदमाती यह ऋतु मतवारी
अंग अंग में सिहरन होवे।
बिन साजन के अगिन लगावै
जब बरसे आॅगन मे सावन।
तन में सावन।।।।।।।।।।।
झूला झूलें कृष्ण मुरारी।
देख रहे हैं सब नर नारी।
राधा अपलक नैन निहारे
कब आयेगी अपनी बारी।
ग्वाल बाल गोपियाॅ गारहे
आयो वृन्दवन में सावन।
तन में सावन।।।।।।।।।
शैलजा सिंह
गाज़ियाबाद
08587086746
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by shailjasingh