कहां गया वो इन्किलाब,
ज़ुल्म के जोर पे उठी आवाज़ |
लाखों उठ खड़े थे एक आवाज़ पे,
गाँधी, सुभाष, भगत के साथ में|
सरों की लाठियों को फूल समझा था,
मिटटी को माँ खुदगर्ज़ी को धूल समझा था|
वो इंकिलाब की जो आवाज़ उठी थी,
ना डूबने वाली हुक़ूमत भी कांप उठी थी |
आज़ादी मिली तो सही पर अधूरी निकली,
दिलों को बांटते हुए कुछ लकीरें निकली |
कुछ सरफिरों ने ग़म में मौके ढूंढे,
खुशिओं को लाश बना रिश्तों में धोखे ढूँढे |
दर्द कई एक साथ चले इस पार या उस पार,
किसी ने घर खोया कोई अपनों को खो लाचार |
उम्मीद के सूरज़ फ़िर उगे तो सही,
दिल वो बंटे तो फ़िर कभी जुड़े ही नहीं ||
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