गया जो मौसम पतझड़ का, नएपन से सृष्टि ने श्रृंगार किया,
नई कोंपलें फूटीं, नई कलियों ने प्रकृति सौंदर्य को धार दिया,
चहुँ ओर चहचहाते पंछियों की चहचहाट में, नूतन सा सुर है,
बागों में लौटी है रौनक नए रंग में, कोयल की कुक सुमधुर है,
आमों के बागानों में मंजरियाँ भी फल बनने को मचल रही हैं,
लदी हुई ये लीचियों की बौरें भी मधुपों को आकृष्ट कर रही हैं,
हरे तरबूजों और लाल खरबूजों से हाट नए सिरे से सज रहा है,
खीरे और ककड़ियों का स्वाद भी सबके जुबान पर चढ़ रहा है,
गेहूँ की बालियाँ भी खेतों में लहलहाकर गीत कोई सुना रही है,
पेड़ों से पतझड़ में बिछड़ी पत्तियाँ, नया जन्म ले बलखा रही हैं,
नए मौसम का आरंभ है, पुरानापन जैसे कहीं खोता जा रहा है,
धरती की बदली छटाएं देख, अंबर भी नया सा होता जा रहा है,
नववर्ष विक्रम संवत् 2083, माता दुर्गा के आगमन से आरम्भ है,
नवीनता के दृश्यमान संकेतों संग आए इस नववर्ष पर हमें दंभ है,
माँ शैलपुत्री की अनुकंपा से जो नयापन अब नवाचारों में आएगा,
बधाई हो ये हिन्दू नववर्ष सबको, ये हममें नवीन उत्साह जगाएगा।
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