पानी

पानी

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Ruchika Rai
Ruchika Rai 27 Aug, 2022 | 1 min read

लिखना चाहती थी पानी पर कविता,

कुछ अपने जज्बात ,कुछ मन के हालात,

मगर कहाँ लिख पाईं।

व्यग्र व्यथित मन पानी पर लिखने के क्रम में

सबसे पहले आँखों के कोरों से गिरे एक बूँद

पर था जा अटका।

हाँ वह पानी ही तो था भावनाशून्यता की स्थिति में,

या फिर नमकीन खारा आँसू,

जो न जाने कितने जतन के बावजूद

आँखों के कोरे से निकल आया था उसे भिंगोने,

 संग में भिंगोये उसने कुछ एहसासात।

फिर थोड़ा ठिठकी सहमी और रुकी,

दूर तक फैला नजर आ रहा था विस्तृत समुंदर,

जिसने अपने अंदर न जाने कितने

रत्नों ,दुर्लभ वस्तुओं को छुपाया था।

जो उग्र होने पर न जाने कितनों ही को,

अपने में समाहित कर लेता था।

और शांत होने पर मनभावन, मन को सुकून

पहुँचाने वाला था।

पानी सरल सहज तरल,निर्मल स्वच्छ

मन को तृप्त करता।

पानी के बिन कहाँ होता जीवन,

कहाँ होता रौनक,

पानी हर रंग में ढलकर उस जैसा हो जाता।

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