आज़ादी की कहानी

आज़ादी की कहानी, धरती मां की भावनाओ से

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Krapanksha kadre
Krapanksha kadre 15 Aug, 2022 | 1 min read

१५ अगस्त की बेला पर , वसुंधरा हरषाई थी।

देख कर सजावट सारी, मन ही मन भरमाई थी।

खौल उठी वो अंगारों सी, एक पल की चौथाई में।

रक्त रंजित हो गई आंखे, यादों की गहराई में।

१८५७ की, वो चिंगारी न बुझ पाई थी।

लक्ष्मी बाई की अगुवाई में जब, स्वतंत्रता की लहर आई थी।

एक - एक कर आते गए, धरती मां के रण बांकुरे।

अपने नाम सजाते गए इतिहास के पन्नों में सारे।

एक से बढ़कर एक वीर, कोई किसी का सामी न था।

लक्ष्य एक था,दुश्मन एक ,अंग्रेजों को भगाना ही था।

सुभाष, भगत, आजाद के जैसे, कई नौजवान आए।

एक ही जाति एक ही धर्म, कि धरती मां का कर्ज चुकाएं।

कई दशक के बाद हमने जब, यह स्वतंत्रता पाई थी।

देखकर रक्त रंजित आंचल, धरती मां सकुचाई थी।

७५ वर्ष लगे हैं उसको, इन घावों को भुलाने में।

आज भी रो देती है बैठी, कहीं किसी मुहाने में।

सोच रही है बच्चे मेरे, आज फिर परतंत्र हुए।

गुलामी की जंजीरों में नही, पश्चिमी विचारों के पराधीन हुए।

सज गए, सज गए सारे चौक चौबारे, स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे।

कल तिरंगे पर पैर रख, बेझिझक जाएंगे।

एक दिन का राष्ट्रीय पर्व, बस यही सोचकर आएंगे।

देश भक्ति चरम पर होगी, कल सब भूल जाएंगे।

क्या वाकई, क्या वाकई इस विचाराधारा से हम।

वसुधा के सपूत कहलाएंगे?

वसुधा के सपूत कहलाएंगे?



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