गुज़ारिश...

गुज़ारिश...

Divya Gosain
26 Jun, 2022 • 1 min read min read • hi
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गुज़ारिश...

गुज़ारिश...

हां, बस एक गुजारिश...


की पाबंदियों से परे अब जीने दो तुम मुझे,

है "पर" जो पास मेरे उन्हें फैला बस एक बार उड़ लेने दो अब मुझे,


नहीं है ख्वाहिश किसी भी शोहरत कि मुझे,

बस हर ज़र्रे से ज़रा सा मुस्कुरा लेने दो अब मुझे,


माना बेहद मुश्किल होगा ये सफ़र,

फिर भी एक छोटी सी कोशिश तो कर लेने दो तुम मुझे,


हां गिरना भी है लाज़मी इस डगर पर कहीं,

कि यूं ही तो नहीं होगा इल्म दर्द से निखरने का मुझे,


आसान है बन जाना गुनहगार अपने पराए की नजरों में यूंही,

अब उस कटघरे में नहीं, ऊंचे आसमानों में उड़ जाना है मुझे,


ख़्वाब देखे हैं इन नजरों ने भी कई,

बस अश्कों की बरसात में नहीं भीगना है अब मुझे,


माना खामियों की कमी नहीं है कोई मुझ में,

बस अपने अक्स से कर सकूं मुलाकात उतना गरूर तो रहने देना तुम मुझ में।


दिव्या G.

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