एक आधुनिक सोच भारतीय संस्कृति पर धब्बा

आधुनिक सोच

Bhavna Thaker
06 Oct, 2020 1 min read min read hi
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एक आधुनिक सोच भारतीय संस्कृति पर धब्बा

शादी की शहनाई का शोर थम गया मानसी के मन में मखमली रोमांच ने जगह ले ली। संकेत का हाथ थामें ज़िंदगी के नये सफ़र के पहले पायदान पर पैर रखते ही मानसी मानों हवा में उड़ रही थी।

छोटे से शहर अहमदाबाद से सीधे दिल्ली जैसे महानगर में कदम रखते ही खुद को खुश नसीब समझ रही थी मानसी। तो साथ में ससुराल में उसको कोई बौने और छोटे विचारों वाली ना समझ ले ये सोचकर संकेत जैसे माॅर्डन ख़यालात वाले लड़के के विचारों संग सामंजस्य बिठाने के लिए मानसी हाई सोसायटी से ताल मिलाने की पूरी कोशिश कर रही थी। स्मार्ट तो थी ही बहुत जल्दी संकेत की दुनिया में घुलने लगी ।

मायके में कहाँ संयमित जीवन जी रही थी रात को दस बजे सोना और सुबह छह बजे उठ जाना। मर्यादित चीज़ों के साथ सहुलियत से जीने वाली मानसी को दिल्ली की चकाचौंध भरी दुनिया भा रही थी। नाईट क्लबों में देर रात तक घुमना, पार्टीस, सुबह देर तक सोना, लक्ज़री गाड़ीयों में लोंगो ड्राइव और बड़ी-बड़ी होटलों में कभी लंच तो कभी डिनर और रिसोर्टस में एश करना। संकेत के इन सारे शौक़ में मानसी ने खुद को बहुत ही जल्दी ढ़ाल दिया।

संकेत को एक से बढ़कर एक अमीर घराने की लड़कीयों के रिश्ते आ रहे थे। पर उसे चाहिए थी एक एसी लड़की जो पढ़ी लिखी भी हो सुंदर और स्मार्ट भी हो और संकेत के रंग ढ़ंग में बिना किसी शिकायत के ढ़ल जाए। और ये सारे गुण मानसी में बखूबी भरे हुए थे।

मानसी और संकेत एक दूसरे को पाकर बहुत खुश थे। घर का माहौल भी स्वछंदतावाद से भरपूर था। कोई किसीकी ज़िंदगी में दखल अंदाज़ी नहीं करता हर कोई अपने-अपने तरीके से ज़िंदगी जी रहे थे।

एक दिन संकेत ने कहा मानसी सुनों आज मेरे दोस्त राहुल के जन्मदिन की पार्टी हिलव्यू रिसोर्ट में रखी है तुम्हें वो ब्लेक गाउन और रियल पर्ल के हल्के इयरिंग पहनकर रेडी होना है। जिसमें तुम आसमान की परी लगती हो।

मानसी ने कहा ओके बेबी एस यू लाईक। 

और शाम सात बजे मानसी टिपटाॅप तैयार होकर निकली तो संकेत देखता रह गया कयामत लग रही थी ब्लेक ईवनिंग गाउन, स्ट्रेटनिंग किये हुए खुल्ले बाल, लाल कलर की लिपस्टिक और क्रिम रियल पर्ल के लंबे इयरिंग में मानसी का रुप खिले हुए ताज़ा कमल जैसे लग रहा था। 

संकेत ने मानसी को बाँहों में भरकर चूम लिया। और दोनों निकल गए बी एम डबल्यू में बैठकर। जैसे ही दोनों रिसोर्ट में दाखिल हुए सबकी नज़र मानसी के उपर लोह चुम्बक की तरह चिपक गई। सारे मर्दों के मुँह से आह निकल गई।

खासकर जिसका जन्मदिन था उस राहुल के शैतानी दिमाग ने तो मानसी को पाने का प्लान भी बना लिया। संकेत मन ही मन अपनी पसंद पर इतरा रहा था।

पार्टी पूरे शबाब पर थी। ऐसी पार्टियों में शराब, सिगरेट आम बात होती है। और अब तो आधुनिकता के नाम पर लड़कीयां भी इन चीज़ों को अपनाने से हिचकिचाती नहीं। तो संकेत के आग्रह पर मानसी ने मन ना होते हुए भी कहीं संकेत बुरा ना मान जाए ये सोचकर दो तीन पैग लगा लिए। पश्चिमी संगीत पर नृत्य करते-करते सब एक दूसरे के साथी के साथ बाँहों में बाँहें डालकर झूम रहें थे। राहुल डांस करते-करते मानसी का हाथ पकड़ कर डांस फ्लोर पर ले गया। मानसी की मरमरी बाँहों को छूते ही राहुल के तन-बदन में आग लग गई।

और संगीत रुकवा कर एनाउंसमेंट करते बोला। हैलो दोस्तों क्यूँ ना आज एक नया खेल आज़माकर एन्जॉय करें खेल का नाम है "वाइफ़ स्वैपिंग"। जिसमें सब अपनी-अपनी गाड़ी की चाबियां एक कटोरे में रखते है। और सबकी बीवीयों की आँखों पर पट्टी बांध कर उस कटोरे में से एक चाबी उठाने को बोलते है। जिसके हाथ में जिसकी चाबी आएँगी वो दोनों आज रात एक साथ बिताएंगे बोलो मंज़ूर ? हम सब अपने-अपने साथी के साथ तो रोज़ आनंद उठाते है क्यूँ ना आज एक दूसरे के पार्टनर के साथ मजे लूटें।

पार्टी खुले ख़यालात वाले आधुनिक लोगों की थी तो किसीने विरोध नहीं किया। सबने राहुल की बात पर रज़ामंदी दे दी। सब नशे में चूर थे तो उसका फ़ायदा उठाते राहुल ने जानबूझकर अपनी तीनों गाड़ी की चाबियां सबसे उपर रखी ताकि कोई एक तो मानसी के हाथ में आए। और चाबी उठाने की पहली बारी मानसी की ही रखी।

मानसी ने पहली बार शराब पी थी तो नशे में क्या हो रहा है ये सोचने की हालत में नहीं थी। यंत्रवत आँखों पर पट्टी बँधवा ली और कटोरे में हाथ डालकर जो चाबी हाथ में आई उठा ली जो राहुल की औड़ी की थी। मानसी के हाथ में अपनी गाड़ी की चाबी देखते ही राहुल की कामेच्छा उसकी आँखों में साँप बनकर लौटने लगी। फ़टाफट खेल खत्म करवा कर सब अपने-अपने हिस्से में आए साथी के साथ रूम में आ गए।

सबने बेहिसाब शराब पी थी किसीको होश नहीं था क्या करने जा रहे थे। मानसी यंत्रवत राहुल के साथ रूम में आई और आते ही बिस्तर पर फिसल पड़ी।

ना खुद का होश था ना कपड़ो का मानसी का लावण्य लौ नेक गाउन को चिरता छलक रहा था जिसे देखकर 

राहुल भूखे भेड़िये की तरह मानसी पर टूट पड़ा और पूरी रात मानसी के बदन को नौंचता रहा।

रात भर वहसियाना खेल हर एक रूम में चलता रहा खिड़की से आती सुबह की पहली किरण ने मानसी की पलकों पर दस्तक दी। आहिस्ता से आँखों को मलती इधर-उधर संकेत को ढूँढने लगी। नशे की वजह से अब भी मानसी का सर चकरा रहा था। बाजु में राहुल को आधे कपड़ों में सोया हुआ देखते ही मानसी झट से उठ खड़ी हुई। पर ये क्या उसके तन पर एक भी कपड़ा ना पाकर शर्म से गुस्से से और धिक्कार से तिलमिलाती कपड़े पहनने लगी। दिमाग सुन्न हो चला था आँखों से आँसू बह रहे थे। 

मोबाइल उठाकर संकेत को लगाया और सीधे बोल दिया चलो घर चलते है मैं गाड़ी के पास खड़ी हूँ। संकेत झट से कपड़े लपेट कर गाड़ी के पास पहुंच गया मानसी रूआँसी सी नतमस्तक खड़ी थी। संकेत शर्म के मारे कुछ बोलने की हालत में नहीं था। चुपचाप से दोनों घर आ गए घर आते ही मानसी बाथरूम में चली गई। एक-एक अंग से राहुल के वहशीपन कि बू आ रही थी। शावर की धार के साथ आँखों से भी आबशार बह रहे थे। तन की कालिख घिस-घिस कर मिटा रही थी और सोच रही थी मानसी मन पर पड़ी स्याही गहरी होती जा रही है कैसे मिटा पाऊँगी वो दाग जो रूह की ज़मीन पर छप गया है। आधुनिकता में ढ़ल कर घिनौने दल-दल में फ़िसल रही हूँ ये मैं क्या से क्या होती जा रही हूँ।

संकेत का बर्ताव मानों कुछ नहीं हुआ जैसा सामान्य देखकर मानसी तिलमिला रही थी। कैसे कोई मर्द अपनी पत्नी को किसी और की आगोश में बर्दाश्त कर सकता है। आज राहुल ने मुझे नौंचा कल कोई दूसरा, उफ्फ़ उल्टी मानसी के हलक तक आ गई खुद की नज़रों से मानों गिर रही थी।

एक हफ्ता बीत गया संकेत को लगा मानसी अब सब भूलकर सामान्य हो गई है तो संकेत मानसी के करीब जाने की कोशिश करने लगा। पर संकेत के नज़दीक आते ही मानसी को राहुल का घिनौना स्पर्श याद आ गया तो दिमाग ज्वालामुखी कि तरह फ़टने लगा।मानसी संकेत को धक्का देकर चिल्लाते हुए घर से बाहर निकल गई।

बड़े घराने की आधुनिक सोच को मानसी अपना तो रही थी पर बचपन के संस्कार मन को कचोट रहे थे। सबकुछ अपना लिया पर इज्जत की अस्क्यामत पर लगा दाग मानसी को पागल कर रहा था। खुद कि नज़रों से ही मानों गिर रही थी। ख़यालो की गुत्थियों में उलझते चलते- चलते कब नज़दीक के रेल्वे ट्रैक पर आ गई पता ही नहीं चला। तन पर लगी कालिख ने मन पर कब्ज़ा ले लिया था। एक विचार दिमाग में घूम रहा था। ताउम्र इस बोझ को ढ़ोते कैसे जीऊँगी ? यही विचार से जूझते एक ठोस निर्णय के साथ रेल्वे ट्रैक के बीचों-बीच खड़ी मानसी और शर्म सार होना नहीं चाहती थी। आँखें बंद किए तन को मौत के हवाले करती फूल स्पीड में आ रही राजधानी एक्सप्रेस के आगे दौड़ पड़ी ट्रेन की व्हिसल में एक चींख दब गई।और खून की झील में एक मासूम और नाजुक तन की कालिख धुल गई।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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