मुकम्मल पहला प्यार

एक लड़की के पहले प्यार की कहानी।

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Bhavna Thaker
Bhavna Thaker 06 Sep, 2021 | 1 min read
Prem Bajaj

(मुकम्मल पहला प्यार) 

यादों के झरोखे से झाँकती उस पल की कशिश आज भी मेरे मन में ताजा गुलाब सी खुशबू भर जाती है। 'जब इश्क मुझे हुआ था' हाँ पहला प्यार जिसे कहते है वही।

उस दिन भोर की पहली किरण ने दस्तक दी मेरी खिड़की से झाँकते, रात को खुद से वादा जो किया था कल से सुबह उठकर सैर पर जाऊँगी तो अनमनी सी उठकर आधी नींद में ही जोगिंग शूज़ पहनकर निकल गई पास के गार्डन में।

एक सिहरन दौड़ गई सुबह का नजारा देखते ही ताज़ा हवा के झोंको ने स्फूर्ति का संचार भर दिया तनमन में।

थोड़ा कोहरा छाया था सामने पहाड़ के पीछे से सूरज के केसरी किरण उत्सुकता से कायनात के सीने पर कदम रखने को बेताब से अठखेलियां कर रहे थे, पंछी घौसला छोड़कर दाना पानी के जुगाड़ में मीठे राग गुनगुनाते चहक रहे थे।

मैं नींद की परछाई से पिछा छुड़ाती धुँधली सी रोशनी में आँखें मलती हल्के कदमों से जोगिंग ट्रेक पर चल रही थी की मेरी नज़र फिसल कर नीचे तालाब के किनारे ठहर गई, एक कामदेव की मूरत सा नौजवान अपनी धून में मगन कानों में इयर फोन लगाए एक्सरसाइज़ कर रहा था।

6 फूट लंबा कद, गठीला बदन वो कहते है ना 6 पैक हाँ वही, पसीने से तरबतर बदन से उसकी टीशर्ट चिपक गई थी तो दिख रहा था आरपार घुँघराले बाल हल्की दाढ़ी और किसी भी कुँवारी कन्या को एक नज़र देखते ही पागल बनाने का पूरा इंतजाम करके जैसे उपर वाले ने उसे बनाया था। मेरे कदम खुद ब खुद रुक गए मैं भूल गई मैं यहाँ क्यूँ आई थी।

एकटुक उसे देखती ही जा रही थी आज तक ऐसी फीलिंग किसीके लिए नहीं हुई। मैंने आँखें झटक ली मेरे आस-पास वाॅकिंग कर रहे लोग मुझे शायद शंका भरी नजरों से देख रहे थे, या शायद मेरा वहम था तो मैं धीरे-धीरे नीचे जाने के लिए जो पायदान थे उसके उपर से उतरती तालाब के किनारे उस कामदेव के करीब से गुज़रने के लिए चल पड़ी। जैसे उसके करीब पहुंच रही थी दिल की धड़कन राजधानी एक्सप्रेस की रफ्तार पकड़ रही थी..! पर ये क्या 10 कदम ही दूर थी की वो अपना सामान समेट कर चल दिया। वो तो चला गया पर मेरे इस खंडहर से मन में एक लौ उदीयमान हो गई किसीके प्रति मोह की।

मैं अनमनी सी उसके ही खयालों में घर आ गई पर पूरा दिन और सारे ख़यालात को परे रखकर एक ही खयाल उसके ही इर्द-गिर्द जाकर ठहरता था..!

दूसरी सुबह के इंतज़ार में रात का हर पहर सदियों सा लग रहा था क्यूँ आज सुबह इतनी दूर लग रही थी, बार-बार नज़रें घड़ी की ओर जाकर उदास लौट आती थी। आँखें उस हसीन नज़ारे को देखने बेताब हो रही थी,पर मन आशंका से घिर रहा था क्या वो रोज़ वहाँ आता होगा, क्या कल भी आएगा, ओर भी न जाने क्या-क्या..!

सोच उस पर ही जाकर अटकती थी की फिर से घड़ी की तरफ़ नज़र गई 5:30 बज रहे थे, आज मैं उससे थोड़ा जल्दी पहुँचना चाहती थी तो झट से उठ खड़ी हुई, और आप हंसना मत पर आज मैं थोड़ा सज सँवर कर निकली बाल ठीक किए, थोड़ा काजल लगाया, लिप ग्लौज़ ओर बोड़ी स्प्रे फूस-फूस करके खुद को आईने में देखा, खुद की ही तारिफ़ में मुँह से निकल गया हाए मर जावाँ तू भी तो कम खूबसूरत नहीं किसी बंदे को अट्रेक्ट करने के सारे गुणों की खान है। पर ये क्या कोहरे की शीत लहर में भी पसीना छूट गया उसका खयाल आते ही, और तेज कदमों से निकल पड़ी।

गार्डन में पहुँचते ही नज़रें इधर-उधर ढूँढ रही थी मनभावन को पर एकल दुक्कल सैर करने वालें अंकल आन्टी ही दिख रहे थे, मै सीढ़ीयाँ उतरकर तालाब के किनारे जहाँ कल वो एक्सरसाइज़ कर रहा था वहाँ पहुँच गई और पास में ही एक बेंच पर बैठ गई..!

पर इंतज़ार की घड़ियाँ हंमेशा लंबी होती है 6:15 बज गए कोई नहीं दिखा, दिल बैठ रहा था मन में नकारात्मक खयालों का कारवां चल पड़ा, लगता है आज नहीं आएगा वो। मैं उठकर चलने लगी की सामने से जोगिंग ट्रेक पर दौड़ता हुआ आ रहा था मेरा पहला प्यार उसे देखते ही दिल धड़क चुक गया। मेरे पास से ही वो गुज़रेगा, ये सोचकर मैं धीरे-धीरे चलने का नाटक करके आगे बढ़ रही थी की वो आगे के छोटे से मोड़ पर मूड़ गया और दौडते हुए आगे बढ़ गया मेरे अरमानो का खून करता हुआ, इतना गुस्सा आया उस पर। पर एक तसल्ली हो गई की वो रोज़ यहाँ आता होगा चलो अब तो रोज दीदार होता रहेगा ये सोचकर एक गुदगुदी ने दिल को नया आयाम दिया।

सभी इंसान एक जैसे ही तो होते है वही दो हाथ, वही दो पांव,आंखे,कान,चेहरा सबके एक जैसे ही तो होते है फिर क्यू कोई एक सिर्फ़ एक ऐसा होता है जो इतना प्यारा लगने लगता है कि उसके लिए कुछ भी कर गुज़रने का मन करें।

क्या है ये, क्यूँ आख़िर मैं एक अजनबी के लिए इतनी बेचैन हो रही हूँ, गलत बात है, ना उसे जानती हूँ, ना पहचानती हूँ फिर कौनसी कशिश मुझे उसकी ओर खिंच रही थी। मन उसके खयालों से बाहर निकलने को तैयार ही नहीं।

जो कुछ भी था पर अब एक सिलसिला बन गया था अंजाम की परवाह किये बिना मैं रोज़ उसके इंतज़ार में कभी 5 तो कभी 6 बजे निकल ही जाती थी उसकी एक झलक पा कर दिल में सुकून लिए लौट आती थी घर। लगभग 5 महीनों का मुसलसल बहता सिलसिला मेरे जीने का मकसद बन गया था।

एसा नहीं की उसने कभी मेरी ओर देखा नहीं बहुत बार आमने-सामने हुए, नज़रे भी टकराई,ओर कुछ एक बार एक दूसरे को देखकर मुस्कुराएँ भी, मैंने बहुत कोशिश की वो मुझे किसी ओर नज़रों से देखे पर बंदा था की मुझे हर बार एक आम सैर करने वालों की नज़रों से ही देखता था। मैं फिर भी खुश थी की चलो कभी ना कभी दोनों में से कोई एक तो पहल करेंगे ही।

पर एक दिन क्या देखती हूँ एक बहुत ही सुंदर लड़की उसके पास खड़ी एक्सरसाइज़ कर रही थी ओर मेरा कामदेव उसे मदद कर रहा था एक्सरसाइज़ के कुछ आसन पीछे से हाथ पकड़कर सीखा रहा था। 

मेरे सीने में एक छन सी आवाज़ आई मानों कुछ चूर-चूर होता टूटकर बिखर गया हो, एक पीड़ उठी मन में ओर रोम- रोम जलन की एक आग में सुलग उठा। मन किया जाकर उस लड़की को हाथ खिंचकर उससे अलग कर दूँ ओर मेरे प्यारे कामदेव से घुटनों के बल बैठकर मेरी बेतहाशा चाहत का इज़हार कर लूँ। पर किस हक से करती ये सब छलकती आँखों से दौड़ कर घर आ गई और जब तक दिल से गुस्सा और दर्द खाली नहीं हुआ तब तक रोती रही। किसको दोष देती मेरे ही खयालों की बसायी एक आभासी दुनिया उज़ड गई थी। उस बंदे को तो पता भी नहीं की कोई अंदर ही अंदर उसे बेपनाह मोहब्बत करता है।

कुछ नहीं बस ख़्वाबों का जहाँ बसने से पहले ही बर्बाद हो गया था। वो पूरा दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे खराब दिन रहा। अगले दिन जाऊँ ना जाऊँ की कश्मकश में रात भर सो नहीं पाई हर रोज़ सुबह का बेसब्री से इंतज़ार रहता था पर आज दिल कह रहा था इस करवटों में कट रही रात की सुबह कभी ना हो। बार-बार पलकों पर ठहरते अश्रु को पोंछ कर थक गई भोर का आगाज़ देता मोबाइल में सेट किया हुआ अलार्म बज उठा। रोज़ थनगनाट से उठते तन में बेसब्री की कोई आहट नहीं हुई मन कह रहा था नहीं जाना पर ये दिल के भीतर की खलबली का कोई इलाज भी तो नहीं बस ये देखने जाना है की आज भी वो लड़की मेरे प्यार के साथ होंगी या नहीं। ओर होंगी तो आख़िर कौन हो सकती है, क्या लगती है उसकी। दिल में एक आस लिए खुद ब खुद कदम चल पड़े एक ही खयाल मन में रम रहा था काश आज वो अकेला हो।

धड़कते दिल से नीचे उतर रही थी मैं उसकी स्पेशल जगह तक पहुँचने मैं कदम आज बोझिल हो रहे थे। अभी तक तो कोई नहीं दिख रहा था मैं बेंच पर बैठ गई कुछ भी सोचने के मूड़ में नहीं थी सबकुछ बदल गया था। वो किसी ओर का था मैं बुद्धु सी खुद ही ब्याही ओर खुद ही विधवा हो गई थी।

मैं खयालों में खोई थी की मेरी नज़र सामने से आ रहे कपल पर पड़ी बहुत सुंदर थी मेरे कामदेव की पत्नी दोनों हंसी मजाक करते टहल रहे थे। मेरे एकदम करीब से गुज़रे, आज उसने मेरी तरफ़ एक नज़र देखा भी नहीं ओर आगे बढ़ गए मेरा मन कर रहा था उनसे बहोत सारे सवाल पूछने का, उन दोनों का रिश्ता पूछने का पर कुछ भी मेरे बस में नहीं था, मेरी आँखे छलक उठी और मैं दौड़ती भागती घर की तरफ़ जा ही रही थी की एक फूल स्पीड में आ रही गाड़ी ने मुझे टक्कर मार दी मैं बेहोश होकर वहीं गिर पड़ी, आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था फिर क्या हुआ कुछ पता नहीं।

पता नहीं आज कितने दिनों बाद होश में आई एक अस्पताल के बेड पर थी धीरे से आँखें खोलकर देखा पास में एक नर्स बैठी थी, मेरे हलन-चलन पर झट से खड़ी हो गई ओर थेंक गोड यू आर ओलराइट कहती हुई दौड़ती हुई डाक्टर को बुलाने चली गई। मैंने अपने सारे बदन पर जगह-जगह पर पट्टियां देखी सर पर भी शायद बहुत चोट लगी थी दर्द हो रहा था तो आँखें मींचे पड़ी रही।

इतने में डाक्टर ओर नर्स आ गए डाक्टर ने सबकुछ चेक किया कुछ सवाल पूछे और एक इंजेक्शन देकर आराम करने को बोला।

पर मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे, पहले तो मुझे हॉस्पिटल किसने पहुँचाया, मैं कितने दिनों बाद होश में आई, और सबसे बड़ा सवाल मेरा ब्लड ग्रुप 'ओ' निगेटिव है जो रेर है इतनी चोट आई है तो ब्लड तो चढ़ाया ही होगा इतनी जल्दी किसने दिया होगा? मैंने नर्स से पूछना चाहा पर उसने मुझे आराम करने को बोला। और दर्द की वजह से मैं भी चुप हो गई दूसरे दिन सुबह नर्स ने स्पंज करके कपड़े बदलकर मुझे बोला डाक्टर ने कहा है अगर आप में हिम्मत है तो थोड़ा चलने के लिए। मैंने नर्स को बोला मैं आपकी बात तभी मानूँगी जब पहले आप मेरे कुछ सवाल के जवाब देंगे बताईये मैं कितने दिनों बाद होश में आई, मुझे यहाँ लेकर कौन आया, ओर मुझे ब्लड किसने डोनेट किया?

नर्स ने कहा आप पूरे पाँच दिन बाद होश में आई है और बाकी के सवालों के जवाब आपको शाम को मिल जाएँगे जब वो इधर आए तो खुद ही पुछ लेना। 

मैं आश्चर्य से देखती रही आख़िर कौन आएगा शाम को नर्स ने कहा वो जो आपको यहाँ लाए ओर अपना खून भी दिया, अब आप आराम किजीए आज मुझे कुछ ठीक लग रहा था तो नर्स के कहने पर थोड़ा उठने की कोशिश की पर चक्कर आ गए तो वापस लेट गई और शाम का इंतज़ार करने लगी। दवाईयों की वजह से कब नींद आ गई पता ही नहीं चला तब आँखें खुली जब एक सुकून सभर हाथ का स्पर्श मेरे सर को महसूस हुआ। मैंने धीरे से आँखें खोलकर देखा मेरी आँखों को, मेरे दिल को, और मेरी धड़कन को यकीन ही नहीं हो रहा था साक्षात मेरा पहला प्यार मेरा कामदेव मेरे इतने करीब बैठकर मेरा सर सहला रहा था। क्या बोलूँ शब्द हलक में ही अटक गए थे कुछ नहीं सूझ रहा था तो मैं बैठने की नाकाम कोशिश करने लगी, तो उसने हाथ पकड़कर वापस सुला दिया मैं सिर्फ़ इतना ही बोली आप यहाँ?

तो उसने कहा जी मैं यहाँ, मेरी सह सैर वाली दोस्त को अकेला कैसे छोड़ता। मैडम इतनी भी क्या जल्दी थी की फूल स्पीड में आ रही गाड़ी तक नहीं दिखी तुम्हें। तुम्हारा एक्सिडेंट होते ही लोग जमा हो गए और सबका शोर सुनते ही मैं दौड़कर वहाँ पहुँचा, देखा तो तुम बेहोश लहू-लुहान पड़ी थी मैंने कुछ भी सोचा नहीं ओर सीधा तुम्हे लेकर यहाँ आ गया। ना तुम्हारे घर का पता था, ना घरवालों का, ना नाम मालूम, ना एड्रेस बस खुद को तुम्हारा अपना समझ लिया और फ़र्ज़ निभा लिया। 

मेरा नाम आगमन है, आपको पार्क में देखता था रोज बस इतनी पहचान काफ़ी थी। और तुम्हारी जाँच करके डाक्टर ने बताया इनका जो खून है वो बहुत रैर ग्रुप हे ओ निगेटिव स्टोक में भी नहीं है पर बंदा हाज़िर जो था मेरा भी वही ग्रुप है तो बस तुम्हारा काम हो गया।

मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था तो छुपके से अपने हाथ पर चूँटी काटी इशश... निकल गई मतलब सपना नही हकिकत थी फिर तो हम दोनों ने बहुत बातें की, उसने मेरे बारे में पूछा, मैने कहा मेरा नाम स्वागता है मैं तो अकेली जान हूँ माँ पापा सूरत में रहते है ओर मैं MBA करके यहाँ बेंगलोर में जाॅब कर रही हूँ, बस कुछ दिनों से मन में एक धून सवार थी तो सुबह सैर करने आ जाती थी। हमारी बातें चल रही थी की डाक्टर राउंड पर आए, मैंने पुछा डाक्टर कब तक रहना पड़ेगा हॉस्पिटल मैं ? 

डाक्टर ने कहा ये कोई छोटी मोटी खरोंच तो है नहीं की आप कल होश में आई ओर आज छुट्टी दे दूँ, कम से कम एक वीक ओर लगेगा ठीक होने में। मैंने कहा फिर तो मुझे ऑफिस में छुट्टी के लिए नोटिस देनी पड़ेगी और माँ पापा को भी बताना पड़ेगा। 

डाक्टर के जाते ही आगमन ने मोबाइल निकला और बोला बारी-बारी नंबर बोलो सबके में मिलाकर देता हूँ तुम बात कर लो, मेरी आँखें नम हो गई मुझे पता ही नहीं चला आगमन ने आँसू मेरी पलकों से उठाकर अपने शर्ट की जेब में रख लिया तो मेरे होंठों पर हंसी आ गई।

 मैंने सब जगह फोन कर लिए और आगमन को थैंक्स बोलकर मोबाइल वापस किया उसकी ऊँगलियों से मेरी ऊँगलियाँ टकराई तो जैसे एक सिहरन दौड़ उठी खून की रवानी में। आगमन की तरफ़ देखकर मैं बोली ओर एक वीक रहना पड़ेगा यहाँ। 

आगमन ने कहा तो क्या हुआ मैं आता रहूँगा ना रोज शाम को आफिस के बाद, 

और सच में शाम होते ही मेरी आँखें और मेरा दिल आगमन के इंतज़ार में बेकल रहते। आगमन रोज आता कुछ ना कुछ साथ में लेकर कभी फ्रूटस तो कभी आइसक्रीम और घंटो मेरे पास बैठकर मुझे हंसाता। 

उसके साथ और परवाह में एक वीक कहाँ निकल गया पता ही नहीं चला और डिस्चार्ज लेने का समय आ गया।

हॉस्पिटल की सारी फोर्मालिटीस आगमन ने पूरी कर दी और मेरा हाथ पकड़कर अपनी गाड़ी में घर तक छोड़ने भी आया। मुझे आज घर बिलकुल नहीं भा रहा था, अस्पताल में थी तो आगमन रोज़ मिलता तो था। मेरे अहसासों ने वापस सर उठाया, पर इतने दिनों में मेरे प्रति इस बंदे के मन के भाव बिलकुल ना पहचान पाई, किस रिश्ते से वो मेरी इतनी परवाह कर रहा था, ना ही मेरी हिम्मत हुई उसे कुछ भी पूछने की। उस दिन वो लड़की उसके साथ कौन थी ये सवाल अब भी मेरे होंठों पर पड़ा जल रहा है। आगमन ने मेरे छोटे से फ्लेट को गौर से देखा ओर नाइस होम बोलकर चलने लगा, अच्छा तो मैं चलूँ अब कह कर जैसे वो जाने के लिए मूड़ा मेरे दिल ने एक दर्द महसूस किया, मानों कुछ छूट रहा हो, कुछ खो रहा हो। पर अब भी हलक से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था, चिल्ला-चिल्ला कर कहना चाहती थी मैं की आगमन मत जाओ मुझे छोड़कर पर इतना ही कह पाई ओके बाय, सी यू ओर वो चला गया।

दिल ही दिल में लग रहा था काश की एक्सिडेंट में मर गई होती बिना आगमन के घुट-घुटकर जीना भी क्या जीना है।

आगमन पर गुस्सा आ गया, क्यूँ वो मुझे वो वाली नज़र से नहीं देखता, क्यूँ कोई भाव नहीं जताता, क्यूँ मैं पहल नहीं कर पा रही, क्यूँ उसको नाम के सिवा कुछ ओर नहीं पूछा इतने सवाल लेकर कहाँ जाऊँ दिमाग में बवंडर उठा था पर शरीर थक गया तो लेट गई।

 दो दिन बीत गए ना वो दिखा ना उसका कोई मैसेज, नंबर तो लिया था मेरा उसने बार-बार मोबाइल चेक करती थी पर उदास दिन कटते थे ओर तन्हा लंबी रातें।

आज मेरा जन्मदिन था हर साल तो दोस्तों को पार्टी देकर या घर बुलाकर मनाती थी पर आज मन ही नहीं किया  

सारे दोस्तों के बर्थडे विश के मेसेज आ रहे थे पर मुझे आज कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, दोपहर के बारह बज रहे थे की डोरबेल बजी अनमनी सी उठकर दरवाजा खोला तो फूल सेन्टर वाले का डिलीवरी बोय हाथ में मेरे फेवरिट गुलाब ओर लीली के फूलों का गुलदस्ता लिए खड़ा था। मैंने आश्चर्य से पूछा किसने भेजा किसके लिए तो वो बोला पता नहीं उसने आपको देने के लिए बोला है और चला गया। मैंने गुलदस्ता उसके हाथ से लेकर उलट पलट के देखा ना किसीका नाम ना एड्रेस मैंने सोचा चलो किसी दोस्त ने भेजा होगा।

सिर्फ़ पोहे बनाकर खा लिए और सो गई, पाँच बजे फिर डोरबेल बजी दरवाज़ा खोलकर देखा तो एक लड़का बहुत बड़ा गिफ्ट पैक लेकर खड़ा था मैंन पूछा किसने भेजा, किसके लिए? तो वो बोला पता नहीं उसने आपको देने के लिए बोला है। मेरी समझ में नहीं आ रहा था ये सब कौन कर रहा होगा सारे दोस्तों को फोन करके देखा पूछने के लिए पर सबके मोबाइल स्विच ऑफ आ रहे थे। मैं हैरान थी पर कुछ सोचने के मूड़ में नहीं थी आगमन के खयालों से लिपटा मन ओर कुछ सोचना ही नहीं चाहता था..!

एसा भी जन्मदिन होता है क्या उदास बोरिंग मैं थोड़ी तैयार हुई पास ही सी सी डी में बैठ कर कोफ़ी पीऊँगी तो शायद मन को अच्छा लगे ये सोचकर। 7 बजे होंगे शाम के मैं निकल ही रही थी की डोरबेल बजी दरवाज़ा खोलकर देखा तो unbelievable नज़ारा एक बार फिर देखा, आगमन मेरे सारे दोस्तों के साथ तालियाँ बजाते हुए हैपी बर्थडे टु यू स्वागता करता हुआ खड़ा था। मैं बुद्धु सी देख रही थी how is this possible आगमन और वो भी मेरे सारे दोस्तों के साथ। इस बार मैं खुद को रोक नहीं पाई नम आँखों से आगमन से लिपट गई थैंक यू सो मच कहते हुए। आगमन ने मुझे कमर से थाम लिया, और आगमन के स्पर्श ने जो मेरे तन-मन में खलबली मचा दी वो स्पर्श की छुअन इतने सालों बाद भी तरोताज़ा सी नस-नस में बहती है। मन में एक सुहाना खयाल उभर आया ये लम्हा यहीं थम जाएँ और मेरी ज़िंदगी यूँही गुज़र जाए आगमन की बाँहों में। 

पर मैंने आगमन से अलग होते हुए सबको अंदर बुलाया सारे दोस्त केक के साथ कुछ ना कुछ गिफ्ट्स लाए थे सबने कुछ न कुछ दिया। पर मुझे आगमन की गिफ्ट का इंतज़ार था पर अपने भाव मन में छुपाते आगमन से पूछा, ओर तो सब ठीक पर आप मेरे दोस्तों को कैसे जानते है और सबके साथ यहाँ कैसे अब सारे राज़ बताओ मुझे। 

आगमन ने कहा स्वागता जब से तुम्हें पहली बार पार्क में देखा तब से मैं तुम्हें पसंद करने लगा था, पहले तुम्हें ठीक से देखा फिर कुछ दिन बाद एक दिन तुम्हारा पिछा किया तुम जहाँ काम करती हो उस आफिस तक पहूँचा, तुम्हारे दोस्तों से मिला, तुम्हारे बारे में सब जाना जैसे-जैसे तुम्हारे बारे में जानता गया तुमसे प्यार होता गया। आगमन के इस (प्यार होता गया शब्दों ने एक बड़ी सी मुस्कान बिखेर दी मेरे होंठों पर)

आगमन ने आगे कहा ओर इतना तो मैं भी जान गया था की तुम भी पार्क में सिर्फ़ सैर करने नहीं आती थी, दूर से भी तुम्हारी आँखों में मेरे लिए तुम्हारी कशिश पहचान लेता था, पगली कुछ दिन सब्र कर लेती मैं बस आज के दिन का ही इंतज़ार कर रहा था, तुम्हारे जन्मदिन का। आज के दिन अपने प्यार का इज़हार करने ही वाला था तुमने अपने जीवन में आगमन के स्वागत की कितनी बड़ी किंमत चुकाई। और हाँ उस दिन जिसे देखकर तुम झुँझलाहट में फूल स्पीड में आती गाड़ी से टकरा गई वो मेरी कज़िन श्वेता थी, उस दिन श्वेता को देखकर तुम्हारे चेहरे की उदासी मैं जान गया था,पर मुझे क्या पता था तुम इतना दिल पर ले लोगी ( मेरी आँखों से आँसू बह निकले) तुम्हारे एक्सिडेंट के बाद खुद को माफ़ नहीं कर पाया, काश उस दिन ही तुम्हें सब सच बता देता और उस दिन ही प्यार का इज़हार कर लेता। और घुटनों के बल बैठकर आगमन ने नम आँखों से सौरी बोलते हुए एक छोटा सा बाॅक्स खोलकर डायमंड रिंग निकाली और एक हाथ दिल पर रखते हुए बोला ये लो मैडम आपकी बर्थ डे गिफ्ट "I love u so much will u marry me" आज मुझे कायनात की सारी खुशियाँ मिल गई थी। मैं आसमान में उड रही थी। मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए बोली मेरे आगमन के आगमन का स्वागता की ज़िंदगी में स्वागत है। आगमन ने मुझे बाँहों में उठाया लिया और सारे दोस्तों ने हम दोनों पर पंखुड़ियों की बारिश की फिर केक खा कर मुझे ओर आगमन को अकेला छोड़कर चले गए, बस अब आगे नहीं कहूँगी क्या हुआ। 10 साल बीत गए आज भी हमारा प्यार कामदेव रति सा तरोताज़ा खिलखिलाता है। आज भी मैं आगमन के लिए उतनी ही पागल हूँ जब पहली बार उनसे इश्क मुझे हुआ था तब थी।

आज हमारे जीवन में दो छोटे-छोटे फूलों का आगमन हो चुका है, अंशुल और अनिका भगवान करे सबको अपना पहला प्यार हासिल हो, पर जो किंमत मैंने चुकाई वो किसीको ना चुकानी पड़े।।

(भावना ठाकर,बेंगुलूरु) #भावु

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Bhavna Thaker

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