Titleदेव अपनी हद में रहो

दार्शनिक ना बने रहो

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Bhavna Thaker
Bhavna Thaker 06 Oct, 2020 | 1 min read

"दार्शनिक ना बने रहो" 

हे प्रभु 

उमड़ते घुमड़ते मन के बादलों से बह रहे आक्रोशित, आंदोलित, आर्तनाद के निनाद का अनुवाद करो। चुनौतियों के रेशे की बुनावट से प्राणों का वितान ना बुनो। 

अम्बरहिन सी वेदना पर सौहार्द का सेतु निर्माण करो। धुँध भरे समय-काल में निर्वहन का आगाज़ दे दो।

बंज़र हो चली सोच की सीमा अंकुरण के इंतज़ार में सहमी, तुहिन सी जम गई। 

तम से खेलती स्याह रात में चाँदनी के नूर का अध्याय लिख दो।

ठहर गई रात ढ़लते आख़री पहर के पायदान पर, पौ फ़टने में देरी क्यूँ ? अनूठे अंदाज़ बदलो

वसुधा के कण-कण पर रोशन सी भोर भर दो।

अमूमन घटित होती हर घटना से परिचित हूँ, अब कुछ अधिक अनहोनी ना हो। सन्नाटों में डूबी ये दुनिया हमारी नहीं ये आशंकित, अवसाद से धिरा आसमान तुम्हारा है तुम ही रख लो।

गति न्यारी समय के चाल की सुखद अनुभूति रेत सी फिसले, आहत करती धूप का ताउम्र डेरा मंथर गति से ठहरा। 

"देव अब अपनी हद में रहो"

समय की सूई हल्की सी मोड़ दो, बिछड़ा काल हमारा हमें वापस दे दो, काँपती हथेलियों पर नया जहाँ रख दो।

सूनी पड़ी विश्व विणा के तारों में अस्फुटित सी मधुर कोई झंकार भर दो।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भाव

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