मेरे पापा मेरे हीरो

पिता के लिए बेटी की भावनाएं।

Babita Kushwaha
21 Jun, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 3 💬 8 👁 1328
#Fatherlove #Myfathermyhero
मेरे पापा मेरे हीरो

Photo by Chirag Saini on Unsplash

नीलू ने मोबाइल खोला तो सभी जगह फादर्स डे की ही बधाइयों के मैसेज थे उसने फिर पापा को फोन लगाया फ़ोन स्विच ऑफ था। आज उसे पापा की बहुत याद आ रही थी शादी के बाद यह पहली बार था कि फादर्स डे के अवसर पर वह पापा के पास नही थी। सुबह से कई बार फ़ोन कर चुकी है लेकिन पापा का फोन अभी भी बंद आ रहा है कितनी बार कहा था पापा से की फ़ोन खराब हो चला है दूसरा ले लो पर हर बार पापा का एक ही जवाब जब तक काम चल रहा चलने दो। जब से शादी हो कर आई हूं एक भी दिन पापा से बात किये बिना नही गुजरा। मन बेचैन था तो नीलू कमरे में आ गई। उसका मन जब भी बेचैन और परेशान होता वह हमेशा अपने कमरे में आकर डायरी लिखती। रवि भी घर पर नही था उसने फिर अलमारी से अपनी डायरी निकाली और कुछ लिखने लगी।


17 जून 2020

माँ को तो हमेशा मैंने दीवार पर ही देखा था। माँ कैसी होती है यह तो सिर्फ दुसरो से ही सुना था। मैं जब एक साल की थी तभी माँ की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी। जब से पापा में ही उसने माँ का रूप देखा था। जब से उसकी याददाश्त है उसने पापा को कभी सोते नही देखा था सुबह जब भी नींद खुलती पापा हमेशा किचन में नाश्ता बनाते हुए मिलते। और रात को उसके सोने तक पापा जागते रहते। स्कूल छोड़ने से लेकर होमवर्क करवाने तक का का मेरा सारा काम पापा ही करते। मेरी किसी भी इच्छा को आज तक उन्होंने अधूरा नही रहने दिया। जो भी उनसे मिलता बस एक ही बात कहता कि "दूसरी शादी क्यों नही कर लेते बड़ी होती बेटी की जिम्मेदारी अकेले कैसे संभालोगे।" पर पापा ने हमेशा अपनी जरूरतो और इच्छाओं से पहले मुझे रखा। पता नही उन्हें कैसे मेरी हर छोटी से छोटी जरूरत का पता चल जाता था। कभी मन उदास होता तो बिन कहे ही मेरी उदासी जान जाते थे। जीवन के हर अच्छे बुरे की सीख मुझे पापा से ही मिली। जब से दिमाग आया था तब से मैंने सबसे यही सुना था बिन माँ की बेटी है पता नही संस्कार और सीख कैसे मिलेंगी। पर मुझे अच्छे से याद है कि कैसे पापा मुझे बड़ा करते हुए माँ बन गये थे। फिर भी अपने जीवन के हर निर्णय आपने मुझे ही लेने दिए चाहे वह दोस्तो का चुनाव हो, शिक्षा का हो या जीवनसाथी चुनने का आपने हमेशा मेरा साथ दिया, मेरा विश्वास किया मेरे हर फैसले का मान रखा।


पर मैं तो आपसे कभी दूर ही नही जाना चाहती थी हमेशा आपके साथ रहना चाहती थी पर इस समय आपने पहली बार मेरे लिए खुद निर्णय लिया था और मुझे शादी के लिए राजी करवाया था। आपके शब्द मुझे आज भी याद की "अगर अपने जीते जी मैं तेरी शादी नही करा पाया तो ये दुनिया का कहा सच हो जाएगा कि एक बाप कभी माँ की कमी पूरी नही कर सकता मेरा जीवन और मेरा संघर्ष तभी पूरा होगा जब मैं अपने हाथों से तेरे हाथ पीले करूंगा।" मुझे आपकी कसम के आगे झुकना पड़ा और मेरी रवि से शादी हो गई। फिर भी कभी कभी लगता है कि काश मैं लड़का होती तो आपसे कभी दूर जाना न होता हमेशा आपके साथ रहती मैं भी एक बेटे का फर्ज निभाती आपको खुशियां देती पर दुआ करती हूं की मेरा दुबारा जन्म लड़के के रुप मे हो और मुझे पिता के रूप में आप ही मिले। आपके प्रति जो फर्ज इस जन्म में अधूरे रह गए वह अगले जन्म जरूर पूरा करू। आप ही मेरा अभिमान, मेरी ताकत और मेरे जीवन के रियल हीरो हो।


इतने में दरवाजे की घँटी बजी। नीलू डायरी को बंदकर दरवाजे की और चल दी। जैसे ही दरवाजा खोला सामने रवि और पापा को साथ मे देखकर चौक गई। एक पल तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही न हुआ। पापा को देखते ही उनके गले लग गई बाप बेटी कई मिनटों तक ऐसे ही गले लगाकर रोते रहे जैसे कई जन्मों के बाद मिल रहे हो।


"अरे भई यहाँ मैं भी हु कोई मुझ पर भी गौर करेगा" रवि के कहने पर नीलू जरा सम्भली। रवि फिर बोला

"आज से पापाजी हमारे साथ ही रहेंगे"


नीलू ने खुशी से अपने पापा की और देखा।

"हाँ बेटा दामाद जी ने मेरी एक न सुनी बोले इस उम्र में आपका अकेले रहना मुझसे देखा नही जाता और देखो मुझे यहाँ अपने साथ ले आये"


" पापाजी अगर आपका कोई बेटा होता तो यू आपको अकेले रहने देता क्या और मैं भी तो आपका बेटा ही हु। नीलू भी यही चाहती है कि आप हमारे साथ ही रहे" रवि के कहते ही नीलू खुशी से चहक उठी। उसकी सारी उदासी दूर हो चुकी थी रवि के जैसा जीवनसाथी पा कर आज उसका मन बहुत खुशी से झूम उठा। कैसे रवि ने उसके मन को पढ़ लिया वह भी समझ न पाई। उसने रवि की ओर देख कर आंखों ही आंखों में धन्यवाद दिया।

दोस्तो मेरी कहानी कैसी लगी कंमेंट करके जरूर बताएं पसंद आये तो लाइक करना न भूलें। धन्यवाद

@बबिता कुशवाहा

3 likes
☕

Support Babita Kushwaha

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Babita Kushwaha
Published By

Babita Kushwaha

@Babitakushwaha

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Kumar Sandeep · 6 years ago last edited 6 years ago

    खूबसूरत रचना

  • Babita Kushwaha · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thankyou

  • Manisha Bhartia · 6 years ago last edited 6 years ago

    Lovely Babita ji ek sawal pucchna tha. Hum sab paperwiff m win kiye hai ,Uske liye kya Hume koi certificate milega,ya Kuch BHI Nahi.please bataye

  • Savita vishal patel · 6 years ago last edited 6 years ago

    Bahut badiyaa

  • Babita Kushwaha · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thanks @manisha ji

  • kushwaha ritu · 6 years ago last edited 6 years ago

    Bahut achi h

  • umesh kushwaha · 6 years ago last edited 6 years ago

    ??

  • Babita Kushwaha · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thankyou @ritu ji @uk kushwaha ji

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Relationship
wayne travel log • 31 Dec, 2025 • 1 min read min

The goth gouls of horror

fun gothic tale of horror

314 0
More stories in Relationship
Subhashree Banik • 03 Nov, 2025 • 9 mins read min

For the contest 'Disasters don't discriminate but humanity unites'

Hard times teach people a lot and they continue to guide us throughout the life. It's a story of transformation and how disaster changed the perspective of people altogether.

311 1
More stories in Relationship
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

360 0
More stories in Relationship
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

455 0