अंधा प्यार

किसी के धोखे की सजा खुद को देना कितना सही??

Babita Kushwaha
27 Oct, 2020 • 1 min read • hi
❤️ 3 💬 4 👁 1108
अंधा प्यार

Photo by Caleb Ekeroth on Unsplash

लिखते लिखते आंखों से आंसू गिर रहे थे... लेकिन रीना बहते आँसुओ के साथ कागज पर कुछ लिखे जा रही थी। उसने कभी नही सोचा था कि आज का दिन उसके जीवन का काल लेकर आएगा। रीना अपने माँ बाप की इकलौती बेटी थी। घर मे शादी की तैयारियां जोर शोर से चल रही थी। दो दिन बाद रीना की शादी जो थी। माँ बाप तो खुशी से फुले नही समा रहे थे। घर मे हँसी खुशी का माहौल था कुछ औरते आंगन में शादी के मंगल गीत गा रही थी।

रीना की सहेलियां भी होने वाले पति का नाम ले ले कर उसे छेड़ रही थी। रीना भी राकेश के दूल्हा बनकर आने और उसे दुल्हन बना कर ले जाने का इंतजार कर रही थी। अभी लगभग 6 महीने पहले ही तो वो राकेश से अपने एक दोस्त के बर्थडे पार्टी में मिली थी। राकेश पढ़ा लिखा था और दिखने में भी स्मार्ट था। राकेश ने रीना को बताया कि वो किसी कंपनी में जॉब करता है और उसका इस दुनिया मे कोई नही है माँ बाप भी कुछ सालों पहले चल बसे है। राकेश की कहानी सुन रीना को उससे लगाव सा हो गया था। बातों बातों में दोनो ने फोन नंबर भी बदले। और फिर शुरू हुआ मुलाकातों का सिलसिला। ये मुलाकातें कब प्यार में बदली रीना समझ ही नही पाई। रीना दिन भर राकेश के ही ख्यालों में खोई रहती। राकेश का उसे एकटक देखना, उसकी हर बात पर चिंता करना, उसका ख्याल रखना रीना को अंदर से गुदगुदा जाता।

रीना की आंखों में राकेश के अंधे प्यार की पट्टी बंध गई थी। उसने राकेश के व्यग्तिगत जीवन के बारे में जानने की कभी कोशिश ही नही कि, जो राकेश बोलता उसके लिए वही सच होता। रीना की सोच राकेश के नाम से ही शुरू होती और उसी पर खत्म। हर रोज मिलना फ़ोन पर घंटो बात करना रीना की आदत बन चुकी थी।

आखिर घर वालो से बात कब तक छुपती रीना ने भी सबके सामने अपने प्यार को स्वीकार कर लिया था। लेकिन रीना के पिताजी को राकेश का अनाथ होना अखर रहा था। राकेश के बारे में उन्होनें अपनी तरफ से भी जानकारी जुटानी चाही लेकिन कुछ खास जानकारी न मिल पाई। पापा ने भी रीना को समझाने की बहुत कोशिश करी, की राकेश उन्हें ठीक लड़का नही लगता लेकिन रीना के सामने तो जैसे राकेश का ही भूत सवार था उसने सबको धमकी दे डाली की शादी करेगी तो सिर्फ राकेश से ही। आखिर माँ बाप को रीना के आगे झुकना पड़ा उसकी खुशी के आगे उनके लिए कुछ नही था। घर मे शादी की तैयारियां होने लगी। शादी के सारे कार्ड बंट चुके थे घर मे मेहमान भी आने लगे थे अब से बस दो दिन बाद रीना हमेशा के लिए राकेश की होने वाली थी।

लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। आज रीना की पक्की सहेली ललिता का फ़ोन आया कि वो कुछ दिनों पहले ही अपने एक रिश्तेदार के यहा दिल्ली आई है यहाँ आज राकेश को एक औरत के साथ उसने मार्केट में देखा। देखने से लग रहा था जैसे वह औरत उसकी बहुत करीबी है इसलिए उसकी फोटो भी चुपके से मैने अपने फ़ोन में निकाल ली है और रीना को व्हाट्सएप पर भेज दी। "अपने एक दोस्त के साथ मैंने उसका पीछा किया तो उसे एक घर मे जाते हुए देखा। पड़ोसियों से पूछा तो पता चला वह वहाँ कई सालों से अपनी पत्नी के साथ रहता है। मतलब वो शादीशुदा है राकेश ने तुझे धोखा दिया है रीना"

रीना के तो मानो पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे ललिता की बातों पर बिल्कुल विश्वास न हुआ उसने तुरंत ललिता की भेजी तस्वीर को देखा वो राकेश ही था उसने वही शर्ट पहन रखी थी जो रीना ने उसे तोहफे में दी थी। उसने अगले ही पल राकेश को फ़ोन किया पर फोन बंद आया। दिमाग मे बहुत जोर डालने पर उसे उसकी कंपनी का नाम याद आया लेकिन जब गूगल पर सर्च किया तब पता चला कि इस नाम की कम्पनी तो शहर में है ही नही। अब उसे ललिता की बातों का यकीन हो चला था क्यों राकेश अक्सर ऑफिस के काम के बहाने से हर दो-तीन दिन में टूर पर जाता था..... टूर पर अक्सर उसका फोन बंद ही होता था.... उस समय तो उसने कभी ध्यान ही न दिया लेकिन अब उसे साफ समझ आ रहा था कि राकेश ने उसके प्यार के साथ खिलवाड़ किया है।

रीना अंदर से टूट गई अभी कुछ देर पहले ही शादी की खुशियों में डूबी थी वह गम में तब्दील हो गई। उसकी आँखों मे आँसू थे लेकिन यह डर था कि अब वह घरवालों का सामना कैसे करेंगी उन्हें कैसे बताएंगी जो बाहर शादी की तैयारियों में लगे हुए है। पापा के मना करने पर भी उसने किसी की एक न सुनी थी। अब तो चारों तरफ उसकी बदनामी ही होगी लोग उस पर हँसेंगे। रीना को अब कोई रास्ता समझ नही आ रहा था सिवाय आत्महत्या के। इसलिए बहते आँसुओ की धार के साथ उसने अपने मन की पीड़ा कागज पर उतार दी। "माँ पापा मुझे माफ़ करना मैंने आपकी बात नही मानी उसकी सजा तो मुझे मिलनी ही थी। आप सही थे राकेश ने मुझे धोका दिया है। ऐसे एन वक़्त पर शादी टूटने की बदनामी मुझसे सहन न होगी हो सके तो मुझे माफ़ करना मैं आपकी अच्छी बेटी न बन पाई" और अपनी जीवन लीला हमेशा के लिए समाप्त कर ली। रीना ने अपना जीवन तो समाप्त कर लिया लेकिन अपने माँ बाप को जीते जी ही मार दिया। राकेश ने तो गलत किया ही लेकिन शायद रीना ने राकेश से भी बड़ा पाप किया उसने सिर्फ अपनी पीड़ा और सिर्फ अपने दुख को देखा लेकिन अपने जाने के बाद अपने माता पिता को होने वाली असहाय पीड़ा और दुख को नही देखा।

दोस्तो क्या रीना ने सही किया। कॉमेंट कर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे। धन्यवाद

3 likes
☕

Support Babita Kushwaha

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Babita Kushwaha
Published By

Babita Kushwaha

@Babitakushwaha

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Savita vishal patel · 5 years ago last edited 5 years ago

    Nice

  • Sonnu Lamba · 5 years ago last edited 5 years ago

    सही बात है, जीवन कभी सीधा सादा नही होता, वक्त के साथ आगे बढना चाहिए, ना कि इस तरह का कदम उठायें..

  • Sonia Madaan · 5 years ago last edited 5 years ago

    हमारे समाज की एक आदत है, दोषारोपण की। गलती होने पर हम उसे कोसते हैं, दोष देते हैं। जजमेंट का यह आचरण बहुत बुरा प्रभाव छोड़ता है। इसलिए कोई किसी के सामने न अपनी गलती को बेझिझक स्वीकार कर पाता है और न ही अपनी दुविधा या अपनी बात कह पाता है। वरना कोई ऐसा कदम न उठाए। परिवार और दोस्तों को विश्वास में लिया जाना चाहिए।

  • Babita Kushwaha · 5 years ago last edited 5 years ago

    अपने बहुमूल्य विचार देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद?

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Crime
wayne travel log • 31 Dec, 2025 • 1 min read

The goth gouls of horror

fun gothic tale of horror

331 0
More stories in Crime
Subhashree Banik • 03 Nov, 2025 • 9 mins read

For the contest 'Disasters don't discriminate but humanity unites'

Hard times teach people a lot and they continue to guide us throughout the life. It's a story of transformation and how disaster changed the perspective of people altogether.

327 1
More stories in Crime
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

371 0
More stories in Crime
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

472 0